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उदयपुर : दूसरों की सांसें बचाना ही जिंदगी: हर रेस्क्यू में मौत से मुकाबला करते हैं हमारे जवान

उदयपुर के सिविल डिफेंस जवान भवानी शंकर लोहरा और विपुल चौधरी वर्षों से अपनी जान जोखिम में डालकर जल हादसों और आपदाओं में लोगों की जान बचा रहे हैं। सैकड़ों रेस्क्यू और शव बरामदगी के बीच उनका एक ही लक्ष्य है-हर संभव जिंदगी को सुरक्षित बचाना।
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भवानीशंकर और विपुल चौधरी

उदयपुर. जब भी कोई जल दुर्घटना, बाढ़, कुएं में गिरने या किसी अन्य आपदा की सूचना मिलती है, तब सबसे पहले जिन लोगों की परीक्षा शुरू होती है, वे हैं सिविल डिफेंस के जवान। उनके लिए हर रेस्क्यू केवल ड्यूटी नहीं, बल्कि जिंदगी और मौत के बीच की लड़ाई होता है। घर से निकलते समय उन्हें भी नहीं पता होता कि वे सुरक्षित लौट पाएंगे या नहीं। परिवार चिंता में रहता है, लेकिन ये जवान अपनी जान की परवाह किए बिना अनजान लोगों की जिंदगी बचाने के लिए हर खतरे में कूद पड़ते हैं। इन्हीं में शामिल हैं भवानी शंकर लोहरा और विपुल चौधरी।

जिंदगी बचाने से बड़ा कोई धर्म नहीं : भवानी शंकर

पिछले नौ वर्षों से राजस्थान नागरिक सुरक्षा विभाग में सेवाएं दे रहे भवानी शंकर लोहरा के लिए हर रेस्क्यू नई चुनौती लेकर आता है। वे कहते हैं, 'जब भी किसी हादसे के लिए घर से निकलता हूं तो यह नहीं पता होता कि वापस लौटूंगा या नहीं।' अब तक वे अपनी टीम के साथ 365 से अधिक शवों को बाहर निकाल चुके हैं, जबकि 211 लोगों की जान बचा चुके हैं। उनके जीवन का सबसे यादगार रेस्क्यू वर्ष 2025 में आयड़ नदी की बाढ़ के दौरान हुआ। तेज बहाव के बीच एक मकान में तीन मासूम बच्चे फंस गए थे और उनके माता-पिता बाहर खड़े रो रहे थे।

बिना अपनी जान की परवाह किए भवानी शंकर नदी के तेज बहाव को चीरते हुए घर तक पहुंचे और तीनों बच्चों को सुरक्षित बाहर निकालकर उनके माता-पिता से मिलाया। आज भी उस परिवार की आंखों में दिखी राहत उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान है। हालांकि हर अभियान सुखद अंत नहीं लेकर आता। वे आज भी बाईजी राज कुंड मंदिर हादसे को याद कर भावुक हो जाते हैं। जल विहार के दौरान छज्जा टूटने से सात महिलाएं कुंड में गिर गई थीं।

उनकी टीम ने पांच महिलाओं को सुरक्षित बाहर निकाल लिया, लेकिन दो को नहीं बचाया जा सका। भवानी कहते हैं कि वह मंजर आज भी आंखों के सामने घूम जाता है। फिर भी हर नई सूचना पर वे उसी जज्बे के साथ निकल पड़ते हैं, क्योंकि उनके लिए किसी की जिंदगी बचाने से बड़ा कोई धर्म नहीं।

हर रेस्क्यू में कोशिश कि किसी घर का चिराग न बुझे : विपुल चौधरी

विपुल चौधरी 9 साल से सिविल डिफेंस में सेवारत हैं। कहते हैं कि हर रेस्क्यू परीक्षा की तरह होता है। परिवार को हमेशा चिंता रहती है कि वे कब लौटेंगे, लेकिन किसी की जान बचाने का संकल्प उन्हें हर बार जोखिम उठाने की ताकत देता है। विपुल और उनकी टीम अब तक 450 से अधिक शवों की तलाश कर उन्हें बाहर निकाल चुकी है, जबकि 150 से ज्यादा लोगों की जान बचाई है। उनके जीवन का सबसे कठिन अभियान केसरियाजी माइंस रेस्क्यू रहा, जहां लगातार तीन दिन तक टीम ने केवल बिस्किट और नमकीन के सहारे अभियान चलाया।

कई बार उन्हें रात दो बजे 100 फीट गहरे कुओं में उतरना पड़ा तो कई बार उफनती नदियों में 17 किलोमीटर तक पैदल और तैरकर शवों की तलाश करनी पड़ी। कोरोना महामारी के दौरान, जब कई लोग अपने परिजनों के पास जाने से भी डर रहे थे, तब विपुल और उनकी टीम ने संक्रमित मरीजों और मृतकों के अंतिम संस्कार तक में पूरी निष्ठा से सेवा दी। जल बचाव के क्षेत्र में दक्षता बढ़ाने के लिए उन्होंने बेंगलुरु से नेशनल कोर्स इन वाटरमैनशिप का प्रशिक्षण प्राप्त किया।

उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उन्हें राज्य और जिला स्तर पर सम्मानित किया जा चुका है। इसके अलावा उन्हें 'बेस्ट कोरोना वॉरियर अवॉर्ड', 'उदयपुर रत्न सम्मान' सहित कई प्रतिष्ठित पुरस्कार मिल चुके हैं। वे कहते हैं, 'हर रेस्क्यू में मेरी कोशिश यही रहती है कि किसी घर का चिराग न बुझे।'