
उदयपुर. जिले में टीबी मरीजों की संख्या में पिछले दो साल से कमी आ रही है। जिले में वर्ष 2023 में टीबी मरीजों की संख्या 8691 तक पहुंच गई थी, लेकिन इसके बाद दो साल मरीजों का आंकड़ा नीचे आया है। वर्ष 2025 में 6727 मरीज दर्ज किए गए। इस तरह दो साल में 1964 मरीज कम हुए हैं। पिछले पांच साल में जिले में 39 हजार से अधिक मरीज सामने आए और इनके उपचार पर 10 करोड़ 24 लाख 74 हजार रुपए खर्च हुए। राहत की बात यह है कि संक्रमण की पहचान के लिए अस्पताल में दो प्रमुख जांच पद्धतियों से मरीजों की जांच की जा रही है।
जिले में पिछले पांच साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2021 में 7271 मरीज मिले थे। वर्ष 2022 में यह संख्या बढ़कर 8265 और 2023 में 8691 हो गई। इसके बाद वर्ष 2024 में मरीजों की संख्या घटकर 8115 रह गई। वर्ष 2025 में और कमी आई तथा 6727 मरीज दर्ज हुए। इस तरह 2023 के मुकाबले 2025 में मरीजों की संख्या में करीब 22.6 प्रतिशत की गिरावट आई। पांच साल में कुल 39,069 मरीज सामने आए।
दो जांचों से संक्रमण की पहचान
टीबी की पहचान के लिए अस्पताल में मुख्य रूप से बलगम की माइक्रोस्कोपी और सीबी-नॉट जांच की जा रही है। माइक्रोस्कोपी में बलगम के नमूने की जांच कर टीबी के जीवाणु का पता लगाया जाता है। वहीं सीबी-नॉट आधुनिक आणविक जांच है, जिससे टीबी के जीवाणु की पहचान के साथ रिफैम्पिसिन दवा के प्रति प्रतिरोध की जानकारी भी मिलती है। इससे मरीज के उपचार की दिशा तय करने में मदद मिलती है।
इन लक्षणों को अनदेखा न करें
बड़ी स्थित टीबी अस्पताल की ओपीडी में प्रतिदिन करीब 150 मरीज पहुंच रहे हैं। इनमें नए मरीजों के साथ पुराने मरीज और उपचार के बाद फॉलोअप कराने वाले लोग भी शामिल हैं। चिकित्सकों के अनुसार लगातार खांसी, दो सप्ताह से अधिक बुखार, रात में पसीना आना, वजन घटना और भूख कम लगना जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे लक्षण दिखने पर समय पर जांच करवानी चाहिए।
टीबी का उपचार संभव है। नियमित दवाएं लेने और चिकित्सकीय सलाह का पालन करने से मरीज स्वस्थ हो सकते हैं। उपचार बीच में छोड़ने से बीमारी दोबारा उभरने और दवा प्रतिरोधी टीबी का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए मरीजों को तय अवधि तक दवा लेने और नियमित जांच कराने के लिए जागरूक किया जा रहा है।
- डॉ. मनोज आर्य, अधीक्षक, टीबी हॉस्पिटल