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उदयपुर का मोची बाजार : 80 साल पुरानी पहचान, विनोद खन्ना और धर्मेन्द्र भी पहन चुके यहां की मोजडि़यां

उदयपुर का मोची बाजार कभी हाथों से बनी पारंपरिक जूतियों और मोजड़ियों के लिए देशभर में मशहूर था। विनोद खन्ना, धर्मेन्द्र और हेमा मालिनी जैसी फिल्मी हस्तियां भी यहां आ चुकी हैं। फिल्म 'मेरा गांव मेरा देश' की शूटिंग के दौरान विनोद खन्ना ने यहां की जूतियां पहनी थीं। समय के साथ बाजार में रेडीमेड फुटवियर और फैंसी सामान का कारोबार बढ़ा, लेकिन ऑनलाइन शॉपिंग, पार्किंग की कमी और पर्यटकों की घटती आवाजाही से पारंपरिक कारोबार प्रभावित हुआ है।
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उदयपुर

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Mukesh Gaur

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Updated: 4 Nov 2026, 6:30 PM IST

mochi bajaar udaipur

उदयपुर का मोची बाजार

उदयपुर. कभी हाथों से तैयार देशी जूतियों के लिए मशहूर मोची बाजार की देशभर में पहचान थी। यहां बनी जूतियों के फिल्मी सितारे भी मुरीद रहे। सिटी पैलेस आने वाला हर पर्यटक यहां की दुकानों तक जाकर अपनी पसंद की जूतियां खरीदरा। समय के साथ बाजार की तस्वीर बदली है, अब हाथों से जूतियां बनाने की जगह रेडीमेड फुटवियर ने ले ली। अब बाजार में जूतों के साथ आर्टिफिशियल ज्वैलरी, शादी-ब्याह की सामग्री और फैंसी आइटम की दुकानें भी हैं। संकरी गलियां, पार्किंग का अभाव और बुनियादी सुविधाओं की कमी परेशानी है।

व्यापारी विशाल राठौड़ ने बताया कि मोची बाजार की सिटी पैलेस से नजदीकी इसकी सबसे बड़ी ताकत है। महल देखने आने वाले देशी-विदेशी पर्यटक बाजार में घूमने आते थे। यहां जूतियों और मोचड़ियों की कई तरह की वैरायटी थी। धर्मेंद्र, हेमा मालिनी और विनोद खन्ना जैसी हस्तियां यहां आ चुकी हैं। फिल्म ''मेरा गांव मेरा देश'' की शूटिंग के दौरान विनोद खन्ना ने इसी बाजार में बनी जूतियां पहनीं। संकरी गलियों में अब वाहनों का दबाव बढ़ गया। पार्किंग की व्यवस्था नहीं होने से पर्यटक अब कम आते हैं। ऑनलाइन शॉपिंग और फैशनेबल रेडीमेड फुटवियर ने भी पारंपरिक बाजार की ग्राहकी को प्रभावित किया है।

जूतों की 50 दुकानें, त्योहारों पर ही ज्यादा रौनक

वर्तमान में 40 से 50 जूतों की दुकानें हैं। इसके अलावा आर्टिफिशियल ज्वैलरी की पांच और शादी-ब्याह की सामग्री की पांच से सात दुकानें संचालित हैं। फैंसी आइटम सहित अन्य जरूरतों का सामान भी मिलता है। यह चलता-फिरता बाजार है, जहां दीपावली और ईद के दौरान ग्राहकों की आवाजाही बढ़ जाती है। सामान्य दिनों में कारोबार अपेक्षाकृत धीमा रहता है।

तीन बड़ी चुनौतियां

- महिला शौचालय और पेयजल की सुविधा नहीं

संकरी गलियों में पार्किंग का संकट

- पर्यटकों की घटती आवाजाही से कारोबार प्रभावित

हमारे दादा-पड़दादा हाथों से जूते तैयार करते थे। जूतों पर हाथ से पॉलिश की जाती थी और राजा-महाराजाओं की पसंद के मुताबिक विशेष जूतियां बनाई जाती थी। अब रेडीमेड फुटवियर का दौर है। ग्राहकों की पसंद और फैशन के हिसाब से बाजार भी बदल गया है।

ललित राठौड़, दुकानदार

80 साल पहले बाजार में मुख्य रूप से जूतियां ही मिलती थी। उस समय इसकी ख्याति दूर-दूर तक थी। अब भीनमाल, जालौर और जोधपुर से तैयार माल आता है। ऑनलाइन खरीदारी और फैशनेबल डिजाइन के कारण पारंपरिक कारोबार धीरे-धीरे सिमट रहा है। पहले पर्यटकों की आवाजाही से बाजार में रौनक रहती थी, लेकिन अब वह माहौल नहीं रहा।

अब्दुल लतीफ, दुकानदार