करोड़ों रुपए खर्च कर चुके हैं महाकाल की शाही सवारी पर
उज्जैन. उनके तन पर पूरे कपड़े भी नहीं रहते. कभी श्मशान में धूमी रमाए दिखते हैं तो कभी क्षिप्रा तट पर तपस्या में लीन बैठे रहते हैं. बाबा बमबमनाथ ऐसे ही अघोरी बाबा हैं जिनका कोई ठौर—ठिकाना ही नहीं है. पर बाबा बमबमनाथ ही हैं जो महाकाल की सवारी का पूरा खर्च उठाते हैं. महाकाल की नगरी में लोग उन्हें इसी रूप में जानते हैं.
सावन—भादौं माह में हर सोमवार महाकाल की सवारी निकलती है. शहरभर में इसकी धूम होती है. सवारी के रास्ते फूलों से सजाए जाते हैं, जगह—जगह बंदनवार लगाए जाते हैं, आतिशबाजी की जाती है. इतना ही नहीं, जगह—जगह टेंट लगते हैं, रेड कारपेट बिछाई जाती है. इनमें लाखों रुपए खर्च होते हैं. महाकाल की सवारी के लिए यह राशि बाबा बमबमनाथ ही चुकाते हैं।
बाबा बमबमनाथ पिछले 15 साल से महाकाल की शाही सवारी में होने वाले खर्च उठा रहे हैं। इस तरह वे शाही सवारी पर करोड़ों रुपए खर्च कर चुके हैं. अघोरी बाबा के पास इतना धन कैसे आ जाता है? पूछने पर बाबा कहते हैं— सब बाबा महाकाल की माया है. वे ही कराते हैं, हमें तो बस जो आदेश मिलता है, उसको पूरा करना रहता है। बमबमनाथ महाकाल के बड़े अनन्य भक्त हैं। वे रोज सुबह महाकाल के दर्शन करने जाते हैं।
शिवभक्तों के लिए उनका हाथ हमेशा खुला रहता है. सावन में महीने भर भंडारा चलाते हैं. कांवड यात्रा के लिए तो हर तरह का इंतजाम करते हैं। कावड़ियों के आने-जाने से लेकर उनके ठहरने, खाने और यहां तक कि जरूरत होने पर दवा तक का प्रबंध बाबा की ओर से ही किया जाता है. बमबमनाथ पूर्ण रूप से अघोरी बाबा हैं, चिलम पीते हैं और तांत्रिक क्रियाएं भी करते हैं।