छह से 18 साल तक के विद्यार्थियों के लिए खेल होगा अनिवार्य, हर स्कूल में लागू होगी योजना।
वाराणसी. स्कूलों में खेल अनिवार्य होगा। इसके लिए मास्टर ट्रेनर नियुक्त किए जाएंगे। ऐसा निर्णय राज्य सरकार ने लिया है। यानी एक बार फिर से स्कूल खेल-कूद को बढ़ावा मिलेगा। मैदान खिलाड़ियों से भरेंगे। बता दें कि 80 के दशक में वाराणसी में ही खेल-कूद का जबरदस्त माहौल रहा। ए, बी और सी डिवीजन की कटेगरी में अलग-अलग हर खेल के मुकाबले हुआ करते थे। लेकिन धीरे-धीरे वह दौर खत्म हो गया। मैदान सूने हो गए। सब कुछ प्रोफेशनल हो गया। स्कूलों के मैदान सूने पड़ गए। खेल व खिलाड़ियों का वजूद ही लुप्त प्राय हो गया। लेकिन अब नई सरकार से एक उम्मीद जगी है कि फिर से खेल संसार में बहार आएगी।
कमिश्नर नितिन रमेश गोकर्ण ने शुक्रवार को जिला विद्यालय निरीक्षक, जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी, क्षेत्रीय क्रीड़ा अधिकारी सहित विभिन्न खेल प्रशिक्षकों की मौजूदगी में यह फैसला सुनाया है। उन्होंने कहा है कि हर हाल में 18 वर्ष तक के विद्यार्थियों को किसी न किसी खेल से अनिवार्य रूप से जोड़ा जाए। उन्होंने बताया है कि स्कूलों में खेल को प्रोत्साहित करने के लिए मास्टर ट्रेनर की नियुक्ति की जाएगी। हालांकि उन्होंने इस संबंध में शिक्षाधिकारियों से कार्ययोजना तैयार करने को कहा है। कमिश्नर ने कहा कि खेल के माध्यम से स्वस्थ समाज का निर्माण होता है। खेल के माध्यम से बच्चे जहॉ मजबूत होते है, वही उनमें प्रतिस्पर्द्वा की भावना भी पेदा होती है जो सफल जीवन के लिए आवश्यक है।
उन्होने सभी पूर्व माध्यमिक एवं इंटर कालेजों में छात्र-छात्राओं को बेहत्तर से बेहत्तर खेल सुविधा उपलब्ध कराने की हिदायत देते हुए कहा कि सभी विद्यालयों में खेल का एक मास्टर ट्रेनर तैनात किया जाय। इसके लिये उन्होने वृहद कार्ययोजना तैयार करने के लिए जिला विद्यालय निरीक्षक व जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी सहित क्षेत्रीय क्रीड़ा अधिकारी को निर्देशित किया। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देशानुसार 06 से 18 वर्ष तक के बालक/बालिकाओं को किसी न किसी खेल से जोड़ा जाना है। हालांकि शासन की इस प्रक्रिया को पूर्णतया लागू करने में एक सबसे बड़ी दिक्कत स्कूलों के पास मैदान का न होना होगा। बता दें कि चाहे यूपी बोर्ड के स्कूल-कॉलेज हों या सीबीएसई अथवा आईसीएसई के, ज्यादा स्कूल घर नूमा परिसर में संचालित हो रहे हैं। उनके पास मैदान है ही नहीं। ऐसे में वहां के बच्चे कहां जाएंगे खेलने के लिए। आलम तो यह है कि मंडलीय प्रतियोगिता में वाराणसी मंडल के अन्य जिलों की टीमें भाग ही नहीं लेतीं। माना जाता है कि वाराणसी में तो कुछ स्कूल-कॉलेजो के पास मैदान है भी, छोटे जिलों में तो यह भी नहीं है। ऐसे में इस नियम को लागू करना प्रशासन के लिए आसान नहीं होगा। सबसे बड़ी समस्या खेल मैदान की होगा। इसकी एक वजह और भी है कि शहर में खाली मैदानों पर तो अब अट्टालिकाएं खड़ी हो गई हैं। स्टेडियम में बिना शुल्क के कोई प्रैक्टिस के लिए भी नहीं जा सकता। अन्य कोई मैदान है नहीं। कुछ स्कूलों ने तो अपने मैदान को अन्य कार्यों में लगा दिया है। ऐसे में उनके विरुद्ध भी कार्रवाई करनी होगी। ऐसा खेल से जुड़े लोगों का मानना है।