
आशा मालवीय, संडे गेस्ट एडिटर
राजगढ़ (मप्र)।. मैं 24 साल की हूं और मैंने साइकिल से पूरे देश में 25 हजार किमी की यात्रा की है, हर संस्कृति की झलक देखी। महिलाओं की सोच को करीब से जानने का मौका मिला। मुझे सभी में एक बात अवश्य नजर आई कि आज की महिला के अंदर जिज्ञासाएं हैं। वे सपने देखती हैं, उड़ान भी भरना चाहती हैं, लेकिन उनमें एक हिचक है। अपनी बात कहने से वह डरती हैं। यही डर, उनमें असुरक्षा का भाव पैदा करता है।
मैं चालीस फीसदी सफर रात में करती थी
मैंने इतनी यात्रा की है, लेकिन मुझे इस दौरान यह नहीं लगा कि मेरा देश महिलाओं के लिए असुरक्षित है। मेरा चालीस फीसदी सफर रात के समय होता था। मुझे लोगों का सहयोग भी बहुत मिला। खासकर उत्तरपूर्व भारत में भारतीय सेना ने न केवल मेरा हौसला बढ़ाया बल्कि उन्होंने मुझे सुरक्षा देने के साथ हरसंभव मदद की।
सही समय पर सही फैसला लें: मैं सभी महिलाओं से यही कहना चाहूंगी कि हमें अपनी सुरक्षा के लिए खुद प्रयास करने होंगे। अपने मन से असुरक्षा का भाव हम तभी निकाल पाएंगी, जब अपने भीतर आत्मविश्वास पैदा कर लें कि हर स्थिति का सामना करने के काबिल हों। सही समय पर सही फैसला लेना भी महिलाओं की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है।
इंडिया इज सेफ फॉर वीमन का संदेश दे रही वैशाली भगत मास्टर
राखी हजेला. जयपुर।
इंडिया इज सेफ फॉर वीमन के साथ ही वीमन एम्पावरमेंट का संदेश दे रही हैं वैशाली भगत मास्टर जो पेशे से आर्किटेक्ट हैं, ऑर्गेनिक फार्मिंंग करती हैं, लेकिन बाइक राइडिंग के प्रति उनके पैशन ने उन्हें एक अलग पहचान दी है। मूल रूप से गुजरात निवासी वैशाली शादी के बाद जयपुर आईं और यहीं की होकर रह गईं। सोलो राइडर के रूप में अपनी पहचान बनाने वाली वैशाली ने राइड करना उस समय शुरू किया जबकि अधिकांश महिलाएं गृहस्थ जीवन में ही फंसकर रह जाती हैं। यानी 41 साल की उम्र में उन्होंने अपने पैशन को फॉलो करना शुरू किया।
वैशाली के मुताबिक बाइक चलाना उन्हें पहले से ही पसंद था और कहीं ना कहीं मन में यह इच्छा भी थी कि वह बाइक के जरिए दुनिया देखे। शादी से पहले एक बार अपने पिता की बाइक लेकर वह निकली थी और इस दौरान चोटिल भी हुईं लेकिन शादी के बाद घर की जिम्मेदारियों और अपने प्रोफेशन को समय देते हुए बाइक राइडिंंग का शौक मन में ही कहीं दब कर रह गया। जब बेटा कुछ बड़ा हुआ तो लगा कि अब कुछ समय खुद को देने की जरूरत है। वैशाली कहती हैं कि मेरे पति ऐसे में मेरा सबसे बड़ा सपोर्ट सिस्टम बने। मैंने पहली राइड 2011 में सूरत में अपनी स्कूल की रियूनियन में जाने के लिए की।
इस दौरान मैंने तकरीबन 2600 किलोमीटर का सफर किया। जब मेरे टीचर्स को इस बात का पता चला तो वह भी अचरज में आ गए। इस राइड से पूर्व भी मैं अपने काम के लिए बाइक लेकर ही निकलती थी, इस दौरान मेरी मुलाकात ट्रेफिक सिग्नल पर एक फेमस बाइक राइडर से हुई। वह भी मुझे बाइक चलाते देखकर आश्चर्य चकित रह गए क्योंकि उस दौरान जयपुर में किसी फीमेल को बाइक चलाते हुए नहीं देखा गया था। उन्होंने मुझे अपने राइडर ग्रुप से मिलवाया। इस समय ना तो सोशल मीडिया था और ना ही लोग इंटरनेट फ्रेंडली थे, लेकिन इस राइड से मेरा खुद पर भरोसा बढ़ा और मैंने इसी तरह से छोटी छोटी सोलो राइड करना शुरू कर दिया, धीरे धीरे मेरे दूसरे शहरों के बाइक राइडर्स से सम्पर्क हुआ और एक फ्रेंड सर्किल बनना शुरू हो गया।
इस सफर में मैने इंडिया पाकिस्तान बॉर्डर का सफर तय किया। पूरा सफर मिट्टी से भरा हुआ था। कई बार ऐसा समय भी आया कि मिट्टी ने पूरी सडक़ ही ब्ल्ॉाक कर दी थी, रेत के टीलों के बीच गर्मी में यह सफर करना मेरे लिए किसी चैलेंज से कम नहीं था।
इसके बाद मैंने फीमेल बाइक राइडर्स का ग्रुप बनाया। आज मेरी उम्र 53 साल है, बेटा यूएसए सेटल हो चुका है लेकिन मेरी बाइक की जर्नी लगातार जारी है। अपनी इस जर्नी में मैंने कई रिकॉर्ड भी बनाए। मैंने ईस्ट टू वेस्ट ऑफ इंडिया की राइड की और इंडिया बुक रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज करवाया। पूरा देश मैं अपनी बाइक के जरिए नाप चुकी हूं।
वैशाली के मुताबिक आमतौर पर लोगों का मानना है कि किसी महिला का इस प्रकार सोलो राइड करना उसकी सुरक्षा की दृष्टि से खतरनाक हो सकता है लेकिन मेरा अनुभव कभी ऐसा नहीं रहा। यहां तक कि यूपी और बिहार जैसे राज्यों जिन्हें महिलाओं के लिए असुरक्षित माना जाता है वहां के लोग भी जरूरत होन पर आपकी मदद ही करते हैं। इसके बाद भी मेरा मानना है कि जब भी किसी राइड पर जाएं तो उससे पहले पूरा होमवर्क करके ही जाना चाहिए। राइड का पूरा प्लान बनाएं। गूगल मैप की मदद लें और देश के दूसरे हिस्सों के बाइक राइडर्स से सम्पर्क में रहें।
वैशाली के मुताबिक कुछ समय पूर्व उन्होंने फीमेल बाइक राइडर का एक और ग्रुप बनाया है इस ग्रुप के जरिए हम डिफरेंट सोशल कॉज कर रहे हैं। फिर भी डोनेशन ड्राइव हो या फिर गरीब बच्चों की मदद करने का काम हो। हम अपनी राइड्स के जरिए वीमन एम्पावरमेंट को बढ़ावा देने का प्रयास कर रहे हैं, हमारा कहना है कि हर महिला को आत्मनिर्भर बनने की जरूरत है, मैं महिलाओं से कहती हूं कि उन्हें अपने बैंक अकाउंट तक खुद ही हैंडल करना आना चाहिए। यह नही कि अगर पैसों से जुड़ा कोई काम करना है तो वह अपने पति या बच्चों पर निर्भर हो जाएं।
साइकिलिस्ट के रूप में बनाई पहचान आप महिलाओं को साइकिल चलाने के लिए कर रही है प्रेरित
ज्योति शर्मा. अलवर। ज्यादातर बालिकाएं स्कूल और कॉलेज के दौरान ही साइकलिंग करती है और इसके बाद उत्तर पढ़ाई के दौरान स्कूटी चलाना ही पसंद करती हैं लेकिन अलवर शहर के मोती डूंगरी निवासी मोना अग्रवाल स्वयं साइकिल भी चलती है और दूसरी महिलाओं को साइकिल चलाने के लिए प्रेरित भी करती हैंl
मोना पेशे se चार्टर्ड अकाउंटेंट है और दो बच्चों की मां भी है l लेकिन बचपन से ही साइकिल चलाने का शौक रखती हैl कोरोना के दौरान सेहत को ध्यान में रखते हुए पति अर्पित गुप्ता ने प्रतिदिन सुबह साइकिल चलाना शुरु किया l पति के प्रेरित करने पर वह स्वयं भी प्रतिदिन साइकिलिंग के लिए जाने लगी l इस दौरान उन्होंने करीब 100 किलोमीटर की साइकिल यात्रा एक ही दिन में पूरी कीl इसके बाद प्रति रविवार और अन्य सरकारी अवकाश के दौरान साइकिलिंग करने लगीl इसके लिए उन्होंने महिलाओं का साइकिल क्लब भी बनायाl अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस, विश्व पर्यटन दिवस, योगा डे, सेव द अर्थ एनवायरमेंट डे विशेष खसम को पर शहर में साइकिलिंग का आयोजन कर लोगों को ज्यादा से ज्यादा साइकिल चलाने के लिए प्रेरित कर रही हैl वह अपने पति के साथ एक साइकिल ग्रुप मत्स्य रांडो नियर में भी नियमित सेवाएं देती हैl
यह क्लब सामाजिक सरोकार के अवसरों पर साइकिलिंग जैसे आयोजन करता हैl इनका कहना है कि महिलाओं को सेहत के लिए जागरूक होने की जरूरत हैl इसके लिए साइकलिंग बेहतर हैl महिलाएं स्वस्थ रहेंगी तो परिवार को भी स्वस्थ रख पाएंगेl कम दूरी के कामों के लिए वाहनों का प्रयोग करने से पर्यावरण प्रदूषण का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा हैl यदि देश में ज्यादातर लोग छोटी दूरी के कामों को साइकिल से करें तो पर्यावरण प्रदूषण से बच सकते हैंl नियमित साइकिल चलाने से शरीर भी फिट रहता है और बीमारियां दूर रहती हैl वजह है की साइकिल क्लब में महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ती जा रही हैl
बुलेट गर्ल शायनी बोली बस्तर की महिलाएं कम रूढ़ीवादी और आत्मनिर्भर
शेख तैय्यब ताहीर . जगदलपुर। बुलेट गर्ल शायनी महिलाओं और बच्चों पर हो रहे हिंसा के खिलाफ कश्मीर तक बाइक पर निकली हैं , जब वो बस्तर पहुंची तो वहां की खूबसूरती के साथ यहां के महिलाओं के जज्बे की वो कायल हो गई। शायनी ने वहां की महिलाओं को खुद की रक्षा के साथ ही आत्मनिर्भता के लिए किए जा रहे उनके प्रयास के बारे में बताया। शायनी कहती हैं कि वो बस्तर के एक दर्जन से अधिक गांव गईं, वहां के लोगों से बातचीत की और उनके साथ समय बिताया तो पाया कि यहां की महिलाएं सिर्फ घर के काम काज तक सीमित नहीं हैं। वे पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलती हैं। बस्तर में ग्रामीण सामाजिक परिवेश में महिलाओं की आजादी छीनने वाली रूढ़ीवादी व्यवस्था नहीं हैं। यही वजह है कि वह चाहे पुरूषों की तरह काम करना हो, खेत संभालना या फिर परिवार सभी में आगे हैं।
सबसे अच्छी बात बेटे बेटियों में कोई फर्क नहीं
आज के दौर में देखा गया है कि सभ्य समाज और पढ़े लिखे लोग भी बेटे और बेटियों में फर्क करते हैं। लेकिन बस्तर के आदिवासी समाज में कुछ समय बिताने के दौरान ऐसा बिल्कुल महसूस नहीं हुआ और न हीं कभी सुना। यह बात इस समाज को दुनिया के सबसे अच्छे समाज के रूप में दिखाती है। हां लेकिन यहां कि महिलाएं बाहरी लोगों से जल्दी घुलने मिलने में जरूर शर्माती हैं, लेकिन एक बार बात शुरू हो जाए तो फिर खुलकर बात करती हैं।
नक्सलवाद नहीं, आत्मनिर्भर महिलाओं के लिए पहचाना जाना चाहिए बस्तर
शायनी बताती हैं कि जब वह कोंटा के रास्ते बस्तर में प्रवेश कर रहीं थी तो वह बहुत डरी हुईं थी। नक्सलवाद और खून खराबे के बारे में सुना था, लेकिन यहां जब बस्तर में प्रवेश किया तो यहां की प्राकृतिक सौंदर्य ने दिल जीत लिया। आदिवासी महिलाएं आत्मविश्वास के साथ काम करती नजर आईं। उन्होंने कहा कि दो दिन में एक बार भी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि यहां दहशत जैसा माहौल है। चाहे परिवार संभालने में हो या फिर आर्ट एंड कल्चरल वर्क सभी में महिलाओं का अहम योगदान नजर आया। इस आधुनिक विचारों से लैस यह समाज किसी भी समाज से आगे है। इसलिए उनका मानना है कि बस्तर को नक्सलवाद के लिए नहीं बल्कि आत्मनिर्भर महिलाओं के लिए पहचाना जाना चाहिए।
महिलाओं के लिए बस्तर सबसे सुरक्षित, समझाना छोड़ सीखकर जा रहीं हूं
शायनी ने बताया कि बस्तर महिलाओं के लिए सबसे सुरक्षित स्थान हैं। उन्होंने पुरा देश घुमा हुआ है बाइक चलाने को लेकर कई बार उन्हें लोगों के भद्दे कमेंट भी सुनने को मिले। लेकिन बस्तर में एक बार भी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि उन्हें लेकर कोई गलत बात कह रहा है। बल्कि लोग आकर उनके बारे में पूछते हुए नजर आए। नक्सली और पिछड़ा इलाका होने के बावजूद भी यहां खतरा एक पल के लिए महसूस नहीं हुआ। यहां के लोग बेहद व्यवहार कुशल और मदद करने वालों में से हैं। वह कहती हैं कि महिला सशक्तिकरण को लेकर लोगों को जागरूक करती हैं लेकिन यहां ऐसा करने का मौका ही नहीं मिला। अब दूसरे जगहों पर यहां की मिसाल दिया करूंगी।