Serena Hotel Islamabad Bill: भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हर बार शर्मिंदगी का सामना कर रहा है। पाकिस्तान की एक बार फिर फजीहत हुई है।
Pakistan Economic Crisis: पाकिस्तान की शहबाज शरीफ सरकार एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय पटल पर बेइज्जती का शिकार हुई है। अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता की मेजबानी के लिए चुने गए पांच सितारा सेरेना होटल का बिल तक सरकार नहीं चुका पाई। होटल का मालिक आगा खान डेवलपमेंट नेटवर्क को खुद आगे आकर पूरा खर्च उठाना पड़ा। यह घटना पाकिस्तान की आर्थिक कंगाली और कूटनीतिक दावों की खोखलापन साफ़ उजागर कर रही है।
सूत्रों के अनुसार, वार्ता के दौरान हुए खर्च का भुगतान न हो पाने के कारण स्थिति इतनी बिगड़ गई कि होटल प्रबंधन को मालिक स्तर पर हस्तक्षेप करना पड़ा। सेरेना होटल इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान की मैराथन बैठक की मेजबानी कर रहा था। पाकिस्तान इस आयोजन को अपनी कूटनीतिक सफलता के रूप में प्रचारित कर रहा था, लेकिन बिल न चुकाने की घटना ने इसे 'पब्लिक रिलेशंस डिजास्टर' बना दिया।
कूटनीतिक हलकों में इस घटना की तीखी आलोचना हो रही है। सूत्रों का कहना है कि इतने बड़े अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में बुनियादी भुगतान न कर पाना प्रशासनिक और आर्थिक कमजोरी का स्पष्ट संकेत है।
पाकिस्तान इस वार्ता के जरिए खुद को अमेरिका और ईरान के बीच भरोसेमंद मध्यस्थ साबित करना चाहता था। सेरेना होटल जैसे लग्जरी वेन्यू को चुनकर सरकार यह संदेश देना चाहती थी कि वह स्थिर और सक्षम मेजबान है। लेकिन एक सामान्य होटल बिल न चुकाना इन दावों की पोल खोल गया।
यह घटना ऐसे समय में आई है जब पाकिस्तान गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। देश अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की सख्त निगरानी में है। महंगाई दर 7 से 9 प्रतिशत के बीच बनी हुई है। विदेशी मुद्रा भंडार कमजोर हैं और UAE जैसे देश भी कर्ज चुकाने का दबाव बना रहे हैं। ऐसे में विदेश नीति के बड़े कार्यक्रमों को भी आर्थिक तंगी प्रभावित कर रही है।
इस्लामाबाद के सेरेना होटल में चली 21 घंटे से ज्यादा की मैराथन वार्ता बिना किसी समझौते के खत्म हो गई। ईरान के परमाणु कार्यक्रम, हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण, आर्थिक प्रतिबंध हटाने और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर दोनों पक्ष आम सहमति नहीं बना सके। वार्ता का मकसद ईरान युद्ध को रोकना और युद्धविराम को मजबूत करना था, लेकिन गहरी असहमति और अविश्वास के कारण यह असफल रही। इससे न सिर्फ मध्य पूर्व में शांति की उम्मीदें कम हुईं, बल्कि पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका भी कमजोर पड़ गई।
यह घटना पाकिस्तान के लिए कई सबक लेकर आई है। एक ओर कूटनीतिक महत्वाकांक्षा, दूसरी ओर घरेलू आर्थिक संकट। शहबाज सरकार के लिए यह स्थिति न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी का कारण बनी है, बल्कि देश की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर रही है।