Bangladesh Rape Cases 2026: बांग्लादेश में सरकार बदलने के बावजूद महिलाओं और बच्चों के खिलाफ बढ़ रही है हिंसा रुकने का नाम नहीं ले रही। ताजा रिपोर्ट के मुताबिक…
Violence Against Women Bangladesh: भारत के पड़ोसी देश बांग्लादेश में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को लेकर हालात लगातार चिंता बढ़ा रहे हैं। सरकार बदलने के बाद भी हिंसा की घटनाओं में कमी नहीं आई है। पिछले 13 महीनों में 776 रेप के मामले सामने आना इस गंभीर स्थिति की ओर इशारा करता है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध लगातार बढ़ रहे हैं, जबकि देश में 'वीमेन एंड चिल्ड्रन रिप्रेशन प्रिवेंशन ऑर्डिनेंस' जैसे कड़े कानून पहले से मौजूद हैं। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर सुधार के कोई ठोस संकेत नहीं दिख रहे हैं।
इस मुद्दे पर अवामी लीग ने भी चिंता जताई है और कई आलोचकों का हवाला देते हुए कहा है कि देश में हालात बेहद गंभीर हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ कानून बनाना काफी नहीं, बल्कि उनके सख्त पालन और समाज में जागरूकता लाना भी जरूरी है, तभी महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।
अवामी लीग के मुताबिक, फरवरी 2026 तक के 13 महीनों में 776 रेप के मामले सामने आए, जिससे लोगों की सुरक्षा को लेकर बड़ी चिंता पैदा हुई है। यह तब है जब हर सरकार महिलाओं की सुरक्षा का वादा करती रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर बदलाव नजर नहीं आ रहा।
आलोचकों ने मोहम्मद युनुस की अंतरिम सरकार और मौजूदा बांग्लादेश नेशनल पार्टी Bangladesh Nationalist Party (BNP) दोनों पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि सरकारें इस समस्या को प्रभावी तरीके से संभालने में नाकाम रही हैं। यूनुस सरकार में कई सलाहकार पहले एनजीओ से जुड़े थे और महिलाओं की सुरक्षा के लिए सक्रिय रहते थे, लेकिन सत्ता में आने के बाद उनकी कोशिशें कमजोर पड़ गईं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ‘वन-स्टॉप क्राइसिस सेंटर’, जो पहले काफी मददगार थे, अब सही तरीके से काम नहीं कर पा रहे हैं। कानून तो बनाए गए हैं, लेकिन उनका सही ढंग से पालन नहीं हो रहा। कई जगहों पर मामलों को अदालत की बजाय गांव के स्तर पर ही निपटा दिया जाता है, जिससे पीड़ितों को पूरा न्याय नहीं मिल पाता।
इसके अलावा, पुलिस और कानून व्यवस्था पर भी सवाल उठे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि कानून और उसके लागू होने के बीच बड़ा अंतर है। यही वजह है कि महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध रुकने का नाम नहीं ले रहे, जो शासन और राजनीतिक इच्छाशक्ति पर गंभीर सवाल खड़े करता है।