
काठमांडू। तिब्बत (शिज़ांग) की सीमा पर प्राकृतिक आपदाओं का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। पिछले हफ्ते आई भीषण तबाही के बाद गुरुवार को तिब्बत क्षेत्र में 5.1 तीव्रता के भूकंप के झटके महसूस किए गए हैं। अमेरिकी भूगर्भीय सर्वेक्षण (USGS) और जर्मन रिसर्च सेंटर फॉर जियोसाइंसेस (GFZ) के अनुसार, इस भूकंप का केंद्र जमीन से महज 10 किलोमीटर की गहराई पर था। भूकंप के इन झटकों ने पहले से ही तबाही झेल रहे सीमावर्ती इलाकों में दहशत और बढ़ा दी है। 26 अगस्त को ग्लेशियर टूटने से आई बाढ़ और मलबे के बहाव में मरने वालों का कुल आंकड़ा बढ़कर 1,273 तक पहुंच गया है।
नेपाल की घाटी में एक बड़े ग्लेशियर के टूटने से बर्फ, कीचड़, पत्थरों और पानी के प्रचंड सैलाब ने पूरे के पूरे गांवों को तबाह कर दिया था। बाढ़ की चपेट में आकर कई बहुमंजिला इमारतें, पुल, बिजली के खंभे और गाड़ियां ताश के पत्तों की तरह बह गईं।
भोटेकोशी नदी के ऊपरी इलाकों में लगातार हो रही बारिश को देखते हुए नेपाल के मौसम व जल विज्ञान विभाग ने रसुवा और नुवाकोट जिलों से गुजरने वाली भोटेकोशी, त्रिशूली और अन्य सहायक नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ने की चेतावनी जारी की है।
नेपाल पुलिस द्वारा गुरुवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, बचाव दलों ने चितवन जिले से 355, नवलपरासी पूर्व से 218 और नवलपरासी पश्चिम से 208 शव बरामद किए हैं। नवलपरासी पश्चिम के आंकड़ों में 18 वे शव भी शामिल हैं जो बहकर भारतीय सीमा में चले गए थे और बाद में नेपाली अधिकारियों को सौंपे गए। इसके अलावा नुवाकोट में 177, रसुवा में 127, गोरखा में 69, धाडिंग में 60 और तनहुं में 38 शव मिले हैं। उधर, चीन के तिब्बत स्थित केरुंग (ग्यिरोंग) काउंटी में 21 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 541 लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं।
नेपाल विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लोक बहादुर छेत्री के अनुसार, तिब्बत में आई इस आपदा के बाद से करीब 100 नेपाली नागरिक लापता हैं। तीर्थयात्रा और व्यापार के सिलसिले में तिब्बत गए करीब 3,000 नेपालियों में से 2,500 से अधिक लोगों को हिल्सा और तातोपानी सीमा चौकियों व हवाई मार्ग से सुरक्षित निकाल लिया गया है। हालांकि, केरुंग बॉर्डर पर अभी भी करीब 1,500 नेपाली फंसे हुए हैं, जिन्हें सुरक्षित स्वदेश लाने के लिए नेपाल और चीनी अधिकारियों के बीच बातचीत जारी है।