
Trump Saudi Arabia Deal: अमेरिका और सऊदी अरब के बीच परमाणु सहयोग समझौता अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां ऊर्जा, कूटनीति और मध्य पूर्व की राजनीति एक-दूसरे से जुड़ गई हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रस्तावित सिविल न्यूक्लियर डील को अमेरिकी कांग्रेस के सामने रख दिया है, लेकिन इसके साथ इजरायल को मान्यता देने की शर्त भी कायम रखी है। यही शर्त अब इस अरब-अमेरिकी समझौते की सबसे बड़ी परीक्षा बनती दिख रही है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने सऊदी अरब के साथ प्रस्तावित नागरिक परमाणु सहयोग समझौते को कांग्रेस के नेताओं के पास भेज दिया है। अमेरिकी प्रशासन के एक अधिकारी के मुताबिक, यह समझौता जुलाई में तय हुआ था और इसके तहत अमेरिकी कंपनियों को सऊदी अरब में नागरिक परमाणु तकनीक उपलब्ध कराने का रास्ता खुल सकता है। समझौते को सोमवार को कांग्रेस भेजा गया और संबंधित समितियों के पास इसकी प्रक्रिया आगे बढ़ने की उम्मीद है।
लेकिन इस पूरे मामले में सबसे बड़ा पेंच परमाणु रिएक्टर नहीं, बल्कि इजरायल है। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि समझौता तभी आगे बढ़ेगा जब सऊदी अरब इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने और अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होने की दिशा में कदम उठाएगा।
इस समझौते पर अमेरिकी कांग्रेस के पास विचार करने के लिए 90 सत्र दिवस का समय है। यदि इस अवधि में कांग्रेस ने आपत्ति नहीं जताई, तो समझौता लागू होने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। वहीं अगर कांग्रेस इसे रोकने का फैसला करती है, तो राष्ट्रपति के पास वीटो का अधिकार होगा। उस वीटो को पलटने के लिए कांग्रेस में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत पड़ेगी।
यानी अब गेंद सिर्फ व्हाइट हाउस या रियाद के पाले में नहीं है। अमेरिकी सांसद भी इस समझौते के भविष्य को प्रभावित कर सकते हैं।
सऊदी अरब लंबे समय से अपनी ऊर्जा व्यवस्था में परमाणु शक्ति को शामिल करने की कोशिश कर रहा है। प्रस्तावित समझौते में AP1000 परमाणु रिएक्टरों के निर्माण की योजना शामिल है। यह परियोजना अरबों डॉलर की हो सकती है और इससे अमेरिकी परमाणु उद्योग को भी बड़ा व्यावसायिक लाभ मिलने की संभावना है।
इस परियोजना से जुड़े प्रमुख कारोबारी हितों में वेस्टिंगहाउस भी शामिल है। कंपनी की मालिकाना संरचना में कनाडा की Cameco और Brookfield Asset Management की हिस्सेदारी है। ऐसे में यह समझौता सिर्फ विदेश नीति का मामला नहीं, बल्कि अमेरिकी कारोबारी और ऊर्जा हितों से भी जुड़ा हुआ है।
ट्रंप ने जुलाई में समझौते की घोषणा के बाद साफ कर दिया था कि सऊदी अरब को इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने होंगे। इसके लिए अब्राहम अकॉर्ड्स एक संभावित ढांचा है। ये समझौते ट्रंप के पहले कार्यकाल में अमेरिका की मध्यस्थता से शुरू हुए थे और इनके जरिए इजरायल ने संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, मोरक्को और सूडान के साथ संबंधों को सामान्य करने की दिशा में कदम बढ़ाया था।
सऊदी अरब अब तक इस व्यवस्था में शामिल नहीं हुआ है। यही वजह है कि वॉशिंगटन की परमाणु महत्वाकांक्षा और रियाद की कूटनीतिक शर्तें आमने-सामने खड़ी नजर आ रही हैं।
सऊदी अरब का रुख लंबे समय से यह रहा है कि इजरायल को मान्यता देने से पहले फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना की दिशा में एक स्पष्ट और अपरिवर्तनीय रास्ता होना चाहिए। 2023 में दोनों देशों के बीच संबंध सामान्य होने की संभावनाएं काफी मजबूत मानी जा रही थीं, लेकिन अक्टूबर 2023 में गाजा युद्ध शुरू होने के बाद क्षेत्रीय समीकरण तेजी से बदल गए।
यही अंतर अब पूरी डील की सबसे बड़ी बाधा बन गया है। ट्रंप इजरायल-सऊदी सामान्यीकरण को समझौते से जोड़ रहे हैं, जबकि रियाद फिलिस्तीन के मुद्दे पर ठोस प्रगति चाहता है।
इस समझौते का दूसरा संवेदनशील पहलू परमाणु अप्रसार यानी न्यूक्लियर नॉन-प्रोलिफरेशन है। कुछ अमेरिकी सांसदों और विशेषज्ञों ने चिंता जताई है कि प्रस्तावित व्यवस्था में सऊदी अरब के यूरेनियम संवर्धन या परमाणु कचरे के पुनर्प्रसंस्करण पर पर्याप्त स्पष्ट रोक नहीं है। ये दोनों गतिविधियां शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम का हिस्सा हो सकती हैं, लेकिन तकनीकी रूप से परमाणु हथियार बनाने की दिशा में भी इस्तेमाल की जा सकती हैं।
इसी वजह से आलोचक इसे संयुक्त अरब अमीरात के साथ 2009 में हुए अमेरिकी परमाणु समझौते से तुलना कर रहे हैं। यूएई ने उस समझौते में संवेदनशील परमाणु गतिविधियों पर कड़े प्रतिबंध स्वीकार किए थे, जिसे अक्सर नॉन-प्रोलिफरेशन का ‘गोल्ड स्टैंडर्ड’ कहा जाता है।