
Maulana Fazlur Rehman: पाकिस्तान की राजनीति में सेना की भूमिका हमेशा से चर्चा का विषय रही है। अब जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (जेयूआई-एफ) के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने देश के सबसे प्रभावशाली सैन्य अधिकारियों में शामिल फील्ड मार्शल असीम मुनीर पर सीधा निशाना साधा है।
फजलुर रहमान ने असीम मुनीर पर निशाना साधते हुए कहा, अगर आपको राजनीति करनी है तो वर्दी उतारकर मैदान में आइए, चुनाव लड़िए। फिर पता चल जाएगा कि वर्दी पहनने वालों को कितने वोट मिलते हैं। उनका यह बयान पाकिस्तान में सेना और राजनीति के रिश्ते को लेकर चल रही बहस के बीच आया है। फजलुर रहमान उन नेताओं में गिने जाते हैं, जो लंबे समय से देश की राजनीति में सेना के प्रभाव पर सवाल उठाते रहे हैं।
मौलाना फजलुर रहमान पाकिस्तान के जाने-माने धार्मिक नेता और अनुभवी राजनेता हैं। उनका जन्म 19 जून 1953 को डेरा इस्माइल खान के अब्दुल खेल इलाके में हुआ था। वह पाकिस्तान के मशहूर धर्मगुरु और राजनेता मुफ्ती महमूद के बेटे हैं। उनके पिता जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम के प्रमुख नेताओं में शामिल थे और 1972 से 1973 तक पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (अब खैबर पख्तूनख्वा) के मुख्यमंत्री भी रह चुके थे। फजलुर रहमान ने शुरुआती शिक्षा धार्मिक संस्थानों से हासिल की। इसके बाद उन्होंने पाकिस्तान के प्रसिद्ध इस्लामी शिक्षण संस्थान दारुल उलूम हक्कानिया समेत कई मदरसों में अध्ययन किया।
साल 1980 में पिता मुफ्ती महमूद के निधन के बाद फजलुर रहमान ने जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम की कमान संभाली। उस वक्त वह काफी युवा थे, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने पार्टी में अपनी मजबूत पकड़ बना ली। बाद में जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम दो हिस्सों में बंट गई। इनमें एक गुट जेयूआई-एफ (फजलुर रहमान) के नाम से जाना गया, जबकि दूसरा गुट जेयूआई-एस (सामी-उल-हक) कहलाया। इस विभाजन के पीछे तत्कालीन सैन्य शासक जनरल जिया-उल-हक की सरकार को लेकर दोनों गुटों की अलग-अलग राजनीतिक सोच को बड़ी वजह माना जाता है।
फजलुर रहमान पाकिस्तान में सेना की राजनीतिक भूमिका के मुखर आलोचक रहे हैं। उन्होंने अपने राजनीतिक करियर के शुरुआती दौर से ही सैन्य शासन और लोकतांत्रिक व्यवस्था के मुद्दों पर अपनी राय खुलकर रखी। हाल के सालों में भी वह कई बार सेना के प्रभाव को लेकर बयान दे चुके हैं। फील्ड मार्शल असीम मुनीर को लेकर दिया गया उनका बयान इसी राजनीतिक रुख का हिस्सा माना जा रहा है। उन्होंने कई मौकों पर पाकिस्तान की सरकार और सुरक्षा नीतियों पर भी सवाल उठाए हैं, खासकर अफगानिस्तान और सीमा पार आतंकवाद से जुड़े मामलों पर।
फजलुर रहमान का नाम अक्सर अफगान तालिबान के साथ उनके संपर्कों को लेकर चर्चा में रहा है। वह अफगानिस्तान के इस्लामिक अमीरात के नेताओं से मुलाकात और बातचीत भी कर चुके हैं। हालांकि, उनकी राजनीति केवल धार्मिक मुद्दों तक सीमित नहीं रही है। वह पाकिस्तान में लोकतंत्र, सत्ता संतुलन और सेना की भूमिका जैसे बड़े राजनीतिक मुद्दों पर भी लगातार अपनी बात रखते रहे हैं।
फजलुर रहमान पहली बार 1988 में डेरा इस्माइल खान से नेशनल असेंबली के लिए चुने गए थे। इसके बाद वह कई बार पाकिस्तान की संसद का हिस्सा रहे हैं। उनकी पार्टी जेयूआई-एफ का प्रभाव खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान के पश्तून बहुल इलाकों में काफी मजबूत माना जाता है। पार्टी को मदरसों और धार्मिक संगठनों के नेटवर्क से भी बड़ा समर्थन मिलता है। 2024 के पाकिस्तान आम चुनाव में जेयूआई-एफ ने 11 सीटों पर जीत हासिल की थी। वहीं फजलुर रहमान ने बलूचिस्तान की नई सीट एनए-265 से चुनाव जीतकर संसद में जगह बनाई।
पाकिस्तान में सेना को लंबे समय से सबसे ताकतवर संस्थाओं में से एक माना जाता है। देश की राजनीति में सेना की भूमिका को लेकर कई बार सवाल उठते रहे हैं। ऐसे समय में जब फजलुर रहमान ने सेना प्रमुख असीम मुनीर को सीधे चुनाव लड़ने की चुनौती दी है, तो यह बयान पाकिस्तान की राजनीति में काफी जरुरी माना जा रहा है। उनकी टिप्पणी ने एक बार फिर पाकिस्तान में पुरानी बहस को तेज कर दिया है।