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जानिए कौन हैं विक्रांत सिंह रिशू जिन्होंने ध्वस्त किया समाजवादी किला, बीजेपी को दी गहरी चोट

राजनीति का युवा चेहरा जिसने न केवल समाजवादी किले को ध्वस्त किया बल्कि बीजेपी को भी गहरी चोट पहुंचाई। भाजपा का पहली बार एमएलसी सीट जीतने का सपना चकनाचूर हो गया। वहीं विक्रांत ने राजनीति के मझे खिलाड़ी कहे जाने वाले अपने पिता यशवंत सिंह के साथ विधान परिषद में बैठने का हक भी हासिल कर लिया।

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विक्रांत सिंह रीशू

विक्रांत सिंह रीशू

पत्रिका न्यूज नेटवर्क
आजमगढ़. एमएलसी चुनाव में आजमगढ़-मऊ सीट जीतकर विक्रांत सिंह रीशू ने न केवल रिकार्ड बनाया बल्कि साबित कर दिया कि वे राजनीति के उभरते हुए मजबूत खिलाड़ी है जिन्होंने कभी हार नहीं मानी। रिशू ने इस चुनाव में न केवल समाजवादी किले को ध्वस्त किया बल्कि बीजेपी का पहली बार सीट जीतने का सपना भी तोड़ दिया। यह अलग बात है कि रीशू के पिता यशवंत सिंह अब भी खुद को भाजपाई बता रहे हैं और दावा किया है कि पार्टी ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है। सारी बातें सिर्फ मीडिया तक हैं। उन्हें कोई सूचना नहीं है। आइए जानते है रीशू का राजनीतिक सफर।

विक्रांत सिंह रीशू मूलरूप से मऊ जनपद के चिरैयाकोट के रहने वाले हैं। वे यूपी की राजनीति में मजबूत पकड़ रखने वाले एमएलसी यशवंत सिंह के पुत्र हैं। रीशू ने इंजीनियरिंग की है। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे अपने पिता एमएलसी यशवंत सिंह व चाचा पूर्व ब्लाक प्रमुख अरूण सिंह के नक्शे कदम पर चलते राजनीति शुरू किये।

विक्रांत सिंह 2015-16 के पंचायत चुनाव में पहली बार मैदान में उतरे। जिला पंचायत की सुल्तानीपुर सीट पर विक्रांत ने लगभग 10 हजार मतों से एकतरफा बड़ी जीत दर्ज की। इस जीत के बाद विक्रांत की निगाहें जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर लगी थी लेकिन अध्यक्ष का पद आरक्षित हो गया। इसके बाद बीते वर्ष हुए त्रि-स्तरीय पंचायत चुनाव में उनकी परंपरागत सुल्तानीपुर जिला पंचायत सीट फिर आरक्षित हो गई। इधर सुल्तानीपुर, सरसेना आदि सीट के आरक्षित हो जाने के चलते विक्रांत करहां से चुनाव लड़ने की तैयारी करने लगे।

इस चुनाव में भाजपा का सिंबल नहीं मिलने के चलते वे चुनाव नहीं लड़े। इसके बाद विक्रांत की निगाहें एमएलसी सीट पर टिक गई। लगभग एक वर्ष से वे लगातार तैयारी में जुटे थे। पंचायत चुनाव में जीत हासिल करने वाले सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों से उन्होंने व्यक्तिगत मुलाकात की। यही कारण रहा कि भाजपा का टिकट नहीं मिलने व पार्टी द्वारा पिता को छह वर्ष के लिए निलंबित किए जाने के बाद भी एकतरफा जीत हासिल कर इतिहास रचा। एमएलसी यशवंत सिंह की रणनीति के आगे आजमगढ़ के दिग्गज रमाकांत यादव की एक नहीं चल पाई। निर्दल विक्रांत ने भाजपा प्रत्याशी सपा विधायक रमाकांत यादव के बेटे अरुणकांत यादव व सपा के निवर्तमान एमएलसी राकेश यादव को हराते हुए पहली बार एमएलसी सीट पर मऊ का परचम लहराया।

बता दें कि आजमगढ़-मऊ स्थानीय प्राधिकारी सीट पर अभी तक आजमगढ़ का ही कब्जा रहा है। अखिलेश यादव की सरकार में इस सीट पर सपा के राकेश यादव गुड्डू निर्वाचित हुए थे। उसके पहले बसपा सरकार में बसपा के कैलाश यादव ने कब्जा जमाया था। इसके पूर्व सपा के कमला यादव व भीमा यादव इस सीट पर काबिज हुए थे। पहली बार मऊ के किसी नेता ने यह सीट जीती है वह भी निर्दल।

एमएलसी चुनाव जीतने के बाद विक्रांत सिंह का कद काफी बढ़ गया है। अब उन्हें पूर्वांचल की राजनीति में उभरता हुआ युवा सितारा माना जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ उनकी जीत से समर्थक जश्न में डूबे हैं। कारण कि स्थानीय प्राधिकारी सीट पर दशकों से चले आ रहे आजमगढ़ के दबदबे को समाप्त करते हुए विक्रांत उच्च सदन पहुंचे हैं। अब प्रदेश की उच्च सदन में पिता-पुत्र की जोड़ी बैठेगी। जीत हासिल करने के बाद जनपद में पहुंचे विक्रांत सिंह का समर्थकों ने जगह-जगह स्वागत किया। चिरैयाकोट स्थित उनके आवास पर देर रात तक अबीर-गुलाल उड़ते रहे।