
बहराइच. दीपावली के एक दिन बाद (जमघट) तंत्र साधना (प्रेमजाल, मायाजाल, वशीकरण) के नाम पर तांत्रिक उल्लुओं को पकड़ते हैं और उनकी बलि देते हैं। दिवाली पर उल्लुओं खासकर घुग्घू उल्लू की सबसे ज्यादा डिमांड होती है। इस दुर्लभ किस्म के उल्लू बहराइच जिले में कर्तनिया के जंगलों में पाए जाते हैं। तांत्रिक अनुष्ठानों और शक्तिवर्धक दवाओं के लिये लगातार हो रहे शिकार के चलते बड़ी तेजी से उल्लुओं की संख्या कम होती जा रही है। इसीलिए उल्लू को संरक्षित प्रजाति के परिंदों में शामिल किया गया है। सरकार ने उल्लुओं की बिक्री और उनके शिकार पर प्रतिबंध लगा रखा है, बावजूद इसके उल्लू धड़ल्ले से बिकते हैं। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में तो कई जगह खुलेआम लक्ष्मी जी के वाहन (उल्लुओं) की खरीद-फरोख्त होती है।
भारत में उल्लुओं की पांच प्रमुख प्रजातियां पायी जाती है, जबकि पूरी दुनिया में उल्लुओं की 13 प्रजातियां हैं। इनमें से तीन प्रमुख प्रजाति ग्रेट हानर्ड आउल, यानी घुग्घू उर्फ़ घाघस उल्लू, ब्राउन वुड आउल यानी भूरे रंग वाला लकड़ी के रंग से मिलता जुलता उल्लू। तीसरी प्रजाति है जंगल आउट लेट आउल यानी जंगली उल्लू। तंत्र साधना को जगाने का सबसे मुफीद समय दीपावली का सीजन माना जाता है। जमघट के दिन तांत्रिकों का गिरोह दुर्लभ प्रजाति के उल्लुओं की बलि देकर अपने मंत्रों को जगाने के साथ ही मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए तांत्रिक अनुष्ठान करते हैं। तांत्रिकों का मानना है कि जमघट के दिन उल्लू की बलि देकर तंत्र साधनाओं को जगाया जा सकता है। हालांकि, इसका कोई वैज्ञानिक या प्रमाणिक रूप नहीं है।
प्रेमजाल, मायाजाल और वशीकरण के लिए देते हैं उल्लू की बलि
सूत्रों की मानें तो दीपावली के दौरान जमघट जगाने के लिये तांत्रिक उल्लुओं का शिकार कर उनकी बलि देकर अपने मंत्रों को जगाने का काम करते हैं। दिवाली के एक दिन बाद तांत्रिकों का समूह एकांतवास में उल्लू की बलि देकर अपने मंत्रों को जगाते हैं। साथ ही उल्लू के नाख़ून, पंख, दिल सहित तमाम अंगों से नजर नाशक, वशीकरण तैयार करते हैं। इन्हें तांत्रिक प्रेमजाल, मायाजाल आदि के लिए इस्तेमाल करते हैं। हालांकि, इसका कोई प्रमाणिक या वैज्ञानिक आधार नहीं है फिर भी तांत्रिक तंत्र साधना के नाम उल्लुओं की हत्या कर रहे हैं, जो पर्यावरण के लिए घातक है।
अंधविश्वास के चलते हो रहा उल्लुओं का शिकार
कतर्निया जंगल से जुड़े वन्य जीव संरक्षक भगवान दास लखमानी का कहना है कि जादू-टोने व अंधविश्वास के चलते उल्लुओं का शिकार हो रहा है। इससे दुर्लभ प्रजाति के उल्लुओं की संख्या कम होती जा रही है। उल्लुओं के प्राकृतिक वास के परिवेश का खत्म होना इस प्रजाति के लिये बहुत बड़ा खतरा है।
...तो इतिहास के पन्नों में रह जाएंगे उल्लू
पर्यावरणविदों का मानना है कि अगर ऐसा ही हाल रहा तो वो दिन दूर नहीं, जब दुलर्भ उल्लू पेंड़ों की शाखाओं पर दिखने के बजाये निकट भविष्य में महज इतिहास के पन्नों में ही नजर आएंगे।
Updated on:
18 Oct 2017 12:37 pm
Published on:
18 Oct 2017 12:34 pm
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