
10वीं. शताब्दी के गोसाईं मंदिर का 44 लाख से शीध्र शुरू होगा कायाकल्प
बालाघाट. जिले के पुरातत्व और पर्यटन प्रेमियों के लिए खुशी की खबर है। जिला के धनसुआ में स्थित प्रसिद्ध गोसाईं मंदिर शीघ्र ही नए स्वरूप में नजर आएगा। इसके जीर्णोद्वार के लिए शासन ने 44 लाख रुपए की राशि स्वीकृति की थी। वहीं निर्माण एजेंसी की टीम मंदिर स्थल पर भी पहुंच गई है, संभवत: आगामी सप्ताह से मंदिर का जीर्णोद्वार कार्य शुरू किए जाने की बात कही जा रही है। पुरातत्व संग्रहालय अध्यक्ष डॉक्टर वीरेन्द्र सिंह गहरवार के नेतृत्व में डीएटीसीसी के तीन सदस्यी दल ने मौका स्थल का निरीक्षण किया, मंदिर समिति के साथ ही भोपाल से पहुंचे निर्माण एजेंसी के पदाधिकारियों के साथ मुलाकात कर आवश्यक चर्चाएं की। इस दौरान मंदिर का किस तरह से कायाकल्प किया जाएगा सहित अन्य मुद्दो पर चर्चा की गई। कलेक्टर डॉ गिरीश मिश्रा से चर्चा के बाद निर्माण कार्य शुरू करवाए जाने की सहमति बनाई गई। निरीक्षण के दौरान डॉक्टर गहरवार के साथ पर्यटन प्रबंधक एमके यादव, निशांत सिंह बैस आदि शामिल रहे।
बता दें कि धनसुआ का गोसाईं मंदिर राज्य शासन के अधीन है। दशकों से उपेक्षा का दंश झेलकर मंदिर काफी जर्जर हो गया है। स्थिति इतनी दयनीय हो चुकी है कि मंदिर का उपरी हिस्सा एक तरफ झुक गया है, जो कब ढह जाए कुछ कहा नहीं जा सकता है। पुरातत्व विदों के जानकारी देने के बाद पत्रिका समय-समय इस मंदिर के कायाकल्प को लेकर प्रमुखता से खबरों का प्रकाशन करते आया है। मामला जिला प्रशासन के बाद शासन तक पहुंचा। शासन स्तर से करीब 44 लाख रुपए की राशि स्वीकृति के बाद अब इसका जीर्णोद्वार कार्य शुरू किया जा रहा है।
1980 में अस्तित्व में आया मंदिर
पुरातत्व शोध संग्रहालय अध्यक्ष व पुरातत्व विद डॉ वीरेन्द्र सिंह गहरवार के अनुसार 27 अक्टूबर 1980 को पीजी कॉलेज का राष्ट्रीय सेवा योजना का कैम्प ग्राम पंचायत धनसुआ में लगा था। इस दौरान ग्राम में स्थित गोसाईं मंदिर को देखा गया,जो काफी जर्जर स्थिति में था। इस प्राचीन मंदि र के संरक्षण के लिए निरंतर पत्राचार किए गए। पणिाम यह रहा कि राज्य सरकार के संस्कृति विभाग ने मप्र प्राचीन स्मारक, पुरातत्वीय स्थल व अवशेष अधिनियम 1964 के तहत इसे राज्य संरक्षित घोषित किया हुआ है।
यह है मंदिर की विशेषताएं
डॉ गहरवार के अनुसार परसवाड़ा विस क्षेत्र के ग्राम धनसुआ में गांव के बाहर स्थित पुराना गोसाईं मंदिर विद्यमान है। इसे शिव आराधना के कारण शिव मंदिर भी कहा जाता है। वर्तमान में गर्भगृह के अंदर कोई प्रतिमा विद्यमान नहीं है, लेकिन मंदिर के शीर्ष पर सीधा ओम अलंकृत है। इसे शिव साधना का तांत्रिक मंदिर कहते हैं। स्थापत्य विद्या की दृष्टि से यह मंदिर 10वीं. शताब्दी का प्रतीत होता है।
सावर मास में पहुंचते हैं श्रद्धालु
स्थानीय ग्रामींणों की माने तो मकर संक्राति और सावर मास और शिवरात्रि में में इस गोंसाईं मंदिर में अधिक संख्या में श्रद्धालु यहां पूजा अर्चना करने पहुंचते हैं। इसके अलावा प्रत्येक सोमवार को भी श्रद्धालु यहां जल अर्पित करने व भगवान शिव की आराधना करने पहुंचते हैं। कायाकल्प शुरू होने की खबर के बाद ऐसे श्रद्धालुओं में खुशी की लहर देखी जा रही है। जिले में पहली बार किसी पुरातात्विक धरोहर के जीर्णोद्वार होने से लोग मौके पर देखने पहुंच रहे हैं।
ऐसे होगा कायाकल्प
पत्रिका से चर्चा के दौरान निर्माण ठेकेदार दीपेन्द्र सिंह सिसोदिया ने बताया कि उन्होंने प्रदेश के कई पुरातात्विक स्थलों का जीर्णोद्वार कार्य किया है। धनसुआ का गोसाईं मंदिर जो कि पूरी तरह से पत्थर से निर्मित है, इसके पत्थरों में दिशा के अनुसार नंबरिंग की जाएगी और पत्थरों को निकाला जाएगा। इसके बाद फाउंडेशन से मजबूत बुनियाद करते हुए पत्थरों उसी तक से पुन: स्थापित किया जाएगा ताकि मंदिर का मूल स्वरूप प्रभावित न हो। 10 वीं शताब्दी के पत्थरों की आवश्यकता पडऩे पर समीप से ही खुदाई गई पत्थरों की व्यवस्था बनाई जाएगी।
फोकस पाइंट-
:- मुख्यालय से करीब 15 किमी दूर धनसुआ पंचायत में आता है गोसाईं मंदिर।
:- 27 अक्टूबर 1980 को की गई थी खोज।
:- शासन ने राज्य संरक्षित किया है घोषित।
:- तांत्रित शिव आराधना के लिए है प्रसिद्ध।
:- सावन, संक्राति और शिवरात्रि में लगाता है मेला।
:- पहली बार 44 लाख से होने जा रही मरम्मत।
:- रीवा और भोपाल के ठेकेदार कर रहे काम।
:- वर्तमान में जर्जर होकर झुक गया है मंदिर।
वर्सन
जिले सहित प्रदेश के पुरातत्व और पर्यटन स्थलो को लेकर मप्र टूरिज्म बोर्ड पूरी तरह गंभीर है। धनसुआ मंदिर के लिए राशि स्वीकृति के बाद अब काम शुरू किया जा रहा है। हमने टूरिज्म मैनेजर और टीम के साथ मंदिर का निरीक्षण किया है। पूरी वस्तुस्थिति से कलेक्टर सर को अवगत कराने के बाद काम शुरू करवाया जा रहा है।
डॉ वीरेन्द्र ङ्क्षसह गहरवार, पुरातत्व शोध संस्थान
Published on:
12 Jan 2024 08:39 pm
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