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सिद्ध कालीपाठ मंदिर- भक्तों की हर मनोकामनाएं होती हैं पूरी

जमीन पर लेटी हुई प्रदेश की एक मात्र प्रतिमानवरात्र पर्व पर होते हैं विविध आयोजन

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बालाघाट. सिद्ध कालीपाठ मंदिर में भक्तों की हर मनोकामनाएं पूरी होती हैं। मातारानी की जमीन पर लेटी हुई प्रदेश की एक मात्र प्रतिमा है। मां काली का ऐसा विराट स्वरुप समीपस्थ जिलों सहित प्रदेश में कहीं भी नहीं है। मातारानी की ख्याति बालाघाट ही नहीं बल्कि पड़ोसी राज्यों में भी है। मान्यता है कि मातारानी के दरबार में पहुंचने वाले श्रद्धालु खाली हाथ नहीं लौटते हैं। प्रदेश के अलावा अन्य राज्यों से भी भक्त मातारानी की पूजा-अर्चना करने और आशीर्वाद लेने के लिए पहुंचते हंै। नवरात्र पर्व पर मंदिर में प्रतिवर्ष विविध धार्मिक आयोजन किए जाते हैं।
मंदिर के पुजारी छोटू पंडा ने बताया कि मातारानी की प्रतिमा स्वयं भू है। यह प्रतिमा कब से अस्तित्व में आई है, इसकी किसी को जानकारी नहीं है। पूर्व में इस स्थल पर जंगल था। जगह पूरी तरह से खाली थी। मातारानी बहुत ही छोटे स्वरुप में विराजमान थी। जंगल होने के चलते गौली इस स्थान पर अपने मवेशियों को चराने के लिए लेकर आते थे। मंदिर में पूजा-अर्चना भी करते थे। अब धीरे-धीरे प्रतिमा का स्वरुप भी बढ़ रहा है। मंदिर का भी जीर्णोद्धार हो गया है। मातारानी की ख्याति भी बढ़ते ही जा रही है। भक्तों के सहयोग से मंदिर को और भी विस्तृत किया जा रहा है।
प्रतिवर्ष मातारानी का बढ़ता है स्वरुप
मंदिर के पुजारी ने बताया कि मातारानी का स्वरुप प्रतिवर्ष बढ़ते जा रहा है। यहां मां काली जमीन पर लेटी हुई मुद्रा में है। जिस मुद्रा में अभी मातारानी है, ऐसा स्वरुप कहीं और देखने को नहीं मिला है। उनका कहना है कि मां के पास समस्याओं से ग्रस्त लोग मन्नते लेकर आते हैं। विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर मातारानी से प्रार्थना कर नारियल बांधकर जाते हैं। जब उनकी मनोकामना पूर्ण हो जाती है तब वे श्रद्धा अनुसार मातारानी को भेंट भी देते हैं। यह सिलसिला काफी वर्षों से चला आ राहा है।
नवरात्र पर्व पर होती है विशेष आराधना
मंदिर के पुजारी के अनुसार नवरात्र पर्व में मंदिर में मातारानी की विशेष आराधना की जाती है। मातारानी का विशेष श्रंगार किया जाता है। घी और तेल के मनोकामना ज्योतिकलश प्रज्जवलित किए जाते हैं। इसके अलावा पूरे नौ दिनों तक मातारानी के जस, गीतों की प्रस्तुति दी जाती है। अष्टमी में मातारानी को भोग लगाया जाता है। नवमीं में कन्या पूजन किया जाता है। इसके बाद ज्योतिकलशों का विसर्जन किया जाता है। महाप्रसाद का वितरण भी किया जाता है।