
उदयमान होते ही प्रभु श्रीराम के चरण स्पर्श करते हैं सूर्यदेव
बालाघाट. जिला मुख्यालय से 25 किमी. पश्चित दिशा की तरफ रामपायली नगरी विद्यमान है। यहां का प्रसिद्ध श्रीराम बालाजी मंदिर भगवान श्रीराम के वनगमन की कई ऐतिहासिक धरोहरों और मान्यतों को समेटे हुए हैं। मान्यता है कि भगवान श्रीराम 14 वर्षो के वनवास के समय इस नगरी में पधारे थे। तब से इस नगरी का नाम राम पदावली अर्थात रामपायली हो गया। यहां प्रभु श्रीराम के दर्शन करने लाखों श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं। देश के नक्शे में भी यह ऐतिहासिक मंदिर अपनी अलग पहचान बना रहा है।
एमपीटीबी के जिला प्रबंधक ने बतााय कि मंदिर के पास कार्तिक मास की पूर्णिमा में प्रतिवर्ष जनपद स्तर से सात दिनों का भव्य मेला लगता है। इस वर्ष 08 नवंबर से मेले का भव्य आगाज किया जा रहा है, जो कि 14 नवंबर तक चलेगा। इसकी तैयारियां भी शुरू कर दी गई है। मौके पर टेंड लगाए जा रहे हैं। पूर्णिमा की रात्रि को भगवान बालाजी की शुद्ध घी से कच्चे धागे की बाती से 15 टिपुर रखे जाते हैं। मेला चंदन नदी के तट पर भरता है। दूर-दूर के लाखों दर्शनार्थी आते हैं और लुफ्त उठाते हैं।
600 साल पुराना मंदिर
श्रीराम मंदिर का निर्माण करीब 600 वर्ष पूर्व भंडारा जिले के तत्कालीन मराठा भोषले ने नदी किनारे एक किले के रुप में वैज्ञानिक ढंग से कराया था। मंदिर में ऐसे झरोखों का निर्माण है, जिससे सुर्योदय के समय सुरज की पहली किरण भगवान श्रीराम बालाजी के चरणों में पड़ती है। भारत के प्राचीन इतिहास में इस मंदिर के निर्माण का उल्लेख है। यहां के लोगों का मानना है कि मंदिर इतना सिद्ध स्थल है कि स्वयं भगवान सूर्यदेव भी उदय होने पर सबसे पहले प्रभु श्रीराम के चरण स्पर्श करते हैं।
मूर्तियों में प्रत्यक्ष दर्शन
श्रीराम मंदिर में प्रमुख सिद्ध मूर्ती बालाजी एवं सीताजी की है। भगवान राम की मूर्ति वनवासी रुप में है। सिर पर जूट और वामांग में सीता का भयभीत संकुचित स्वरुप है। राम भगवान का बाया हाथ विराट राक्षक को देखकर भयभीत सीता के सिर पर उन्हें अभय देते हुए हैं, जो भक्तों कों भगवान राम और सीता के प्रत्यक्ष दर्शन कराते हैं।
स्वप्न में दिखी मूर्ति
स्थानीय बुजुर्गो के अनुसार भगवान राम की वनवासी वेशभूषा वाली यह प्रतिमा करीब चार सौ वर्ष पूर्व चंदन नदी के ढोह से किसी व्यक्ति को स्वप्न में दिखाई देने से प्राप्त हुई थी। मूर्ति को निकालकर नदी की टेकरी पर नीम के वृक्ष के नीचे टिका दिया गया और राजा भोषले ने मंदिर का जीर्णोद्वार कर मूर्ति की स्थापना की। सन 1877 में तत्कालीन तहसीलदार स्व. शिवराज सिंह चौहान ने मंदिर का जीर्णोद्वार कराया। यह भूमि दशरु पटेल से गांव खरीदकर रामचंद्र स्वामी देवास्थान ट्रस्ट की स्थापना की गई।
लगंडे हनुमान जी
पौराणिक मान्यता के अनुसार पूर्व मुखी लंगड़े हनुमान जी की मूर्ति का एक पांव जमींन और दूसरा पांव जमींन के अंदर होने से स्पष्ट दिखाई नहीं देता है। वर्षो पूर्व एक समिति ने हनुमान जी की मूर्ति हटाकर मंदिर में स्थापित करने की कोशिश की थी। तब करीब पचास फिट से अधिक का गढ्डा खोदा गया, लेकिन पांव का दूसरो छोर नहीं मिल सका। तब हनुमान जी ने स्वप्न में आकर बताया कि मूर्ति नदी किनारे ही रहने दो यदि मंदिर ही बनवाना है तो मूर्ति के पास बनवाओं। मान्यता है कि हनुमान जी का एक पांव पातल लोक तक गया है। यहां पहुंचने वाले भक्त इन मूर्तियों की कहानियां सुनकर भक्ति भाव से ओत प्रोत हो जाते हैं।
स्वयं प्रगट शिवलिंग
इसी प्रकार लोगों की हर मनोकामना पूर्ण करने वाली शिवलिंग के दर्शन करने भी दूर-दूर से श्रृद्धालु पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शिवलिंग स्वयं प्रगट हुई है। हजारों वर्ष पूर्व एक बुढिया के आंगन में रेत की शिवलिंग बनती थी। लेकिन बुढिय़ा उसे कचरा समझकर झाड़ दिया करती थी। कई बार झाडऩे के बाद भी शिवलिंग नहीं हटी और स्थापित हो गई।
ऐसे पहुंचे पर्यटक और श्रद्धालु
एमपीटीबी के जिला प्रबंधक ने बताया कि श्रीराम बालाजी मंदिर तक पहुंचने पहले काफी तकलीफों का सामना करना पड़ता था। लेकिन अब सभी तरह के संसाधन उपलब्ध है। दिल्ली और मुंबई से पहुंचने वाले सैलानी गोंदिया, नागपुर महाराष्ट्र तक हवाई यात्रा से पहुंचते हैं। गोंदिया तक हवाई यात्रा या फिर ट्रेन के माध्यम से वारासिवनी या बालाघाट पहुंचा जा सकता है। मुख्यालय पहुंचने पर निजी यात्री बसें प्रतिदिन रामपायली आवागमन करती है। राम पायली बस स्टैंड से कुछ मीटर दूरी पर ही श्रीराम बालाजी का भव्य मंदिर स्थापित है। वहीं कई ट्रेवल एजेंसियों से संपर्क कर भी रामपायली देवास्थान के साथ जिले के अन्य पर्यटक स्थलों का भ्रमण किया जा सकता है।
Published on:
04 Nov 2022 08:07 pm
बड़ी खबरें
View Allबालाघाट
मध्य प्रदेश न्यूज़
ट्रेंडिंग
