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ग्रामीणों ने खोदा पहाड़, गांव पहुंचने बनाई सड़क

लकडिय़ों के सहारे रोशन हो रहे घर, पेयजल की भी नहीं है सुविधादूषित पानी पीने से बीमार हो रहे ग्रामीण

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ग्रामीणों ने खोदा पहाड़, गांव पहुंचने बनाई सड़क

ग्रामीणों ने खोदा पहाड़, गांव पहुंचने बनाई सड़क

भानेश साकुरे
बालाघाट. माउंटेन मैन के नाम से प्रसिद्ध हुए बिहार के गया के करीब गहलौर गांव के दशरथ मांझी ने अकेले पहाड़ी को खोदकर सड़क बना ली थी। लेकिन बालाघाट जिले के आदिवासी अंचल का एक गांव पूरा-पूरा का दशरथ मांझी बन गया। दरअसल, यहां के ग्रामीणों ने गांव पहुंचने के लिए पहाड़ी को खोदकर रास्ता बना दिया। भले ही यह रास्ता अभी कच्चा है, लेकिन ग्रामीणों की सुविधा के लिए बेहतर है। मामला जिले के आदिवासी अंचल दक्षिण बैहर के ग्राम पंचायत धुनधुनवार्धा के ग्राम केरीकोना का है। भले ही यहां की आबादी ज्यादा नहीं है, लेकिन केरीकोना के ग्रामीणों ने एक नजीर पेश की है।
जानकारी के अनुसार दक्षिण बैहर के ग्राम पंचायत धुनधुनवार्धा का ग्राम केरीकोना चारों ओर से पहाडिय़ों से घिरा हुआ है। यहां पर करीब एक दर्जन आदिवासी परिवार निवास करते हैं। ग्रामीणों को सुविधाओं के नाम पर कुछ भी नहीं मिल रहा है। हालांकि, ग्रामीणों ने अनेक बार ग्राम पंचायत के पदाधिकारियों को सुविधाएं मुहैया कराए जाने की मांग की, लेकिन पंचायत पदाधिकारियों ने इन ग्रामीणों की नहीं सुनी। उल्लेखनीय है कि ग्राम केरीकोनो
प्रशासन ने नहीं पहुंचाए विद्युत खंभे
गांव में घरों को रोशन करने के लिए ग्रामीणों को स्वयं ही मेहनत करनी पड़ी है। दरअसल, ग्रामीणों ने स्वयं लकडिय़ों के सहारे विद्युत तार का विस्तार किया। इधर, गांव में विद्युत तार का विस्तार होने के बाद विभाग ने ग्रामीणों को कनेक्शन दे दिया है। जिसका ग्रामीण बिल भी जमा कर रहे हैं। ग्रामीणों द्वारा करीब एक वर्ष पूर्व से लकडिय़ों के सहारे बिजली अपने गांव तक पहुंचाई है।
निस्तार के लिए लेते हैं नाले का पानी
केरीकेना गांव में पेयजल की समस्या बनी हुई है। यहां के ग्रामीण गांव के बाहर तालाब के किनारे बने एक कुएं के सहारे अपनी प्यास बुझाते हैं। इतना ही नहीं निस्तार के लिए नाले के पानी का उपयोग करते हैं। कभी-कभार तो नाले का पानी भी पेयजल के रुप में उपयोग कर लेते हैं। जिसके कारण उनमें संक्रामक बीमारी होने की संभावना बनी रहती है। विडम्बना यह है कि गांव में हैंडपंप भी नहीं है। जिसके कारण ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल नहीं मिल पाता है। यह समस्या किसी एक दिन की नहीं है। बल्कि वर्षों से बनी हुई है।
नहीं मिले वनाधिकार के पट्टे
ग्रामीणों ने बताया कि उन्हें वनाधिकार के पट्टे नहीं मिल पाए हैं। जबकि वे उक्त ग्राम में वर्षों से निवास करते हैं। दूसरी ओर शासन द्वारा वन भूमि पर निवास कर रहे आदिवासियों को वनाधिकार के पट्टे प्रदान कर रही है। लेकिन ग्राम केरीकोना के ग्रामीण इससे अछूृते हैं।
संक्रामक बीमारी के चपेट में ग्रामीण
यहां के ग्रामीण अब धीरे-धीरे संक्रामक बीमारी की चपेट में आने लगे हैं। दरअसल, हाल ही में आयुर्वेद चिकित्सक डॉ. रमेश सेवलानी द्वारा यहां निशुल्क स्वास्थ्य जांच शिविर का आयोजन किया गया था। जिसमें ग्रामीणों में कुपोषण, खून की कमी, चर्म रोग जैसी बीमारियां सामने आई है। डॉक्टर के अनुसार ग्रामीणों के गंदे माहौल में रहन-सहन करने, गंदा पानी पीने की वजह से इस तरह की बीमारी हो रही है।
इनका कहना है
गांव में पहुंचने के लिए सड़क नहीं थी। ग्रामीणों ने श्रमदान कर स्वयं पहाड़ी को काटकर रास्ता बना दिया है। ताकि ग्रामीणों को आवागमन में सुविधा हो। ग्रामीणों को वनाधिकार के पट्टे भी नहीं मिले हैं।
-जेठू सिंह, ग्रामीण
गांव में पानी की समस्या बनी हुई है। न तो कुआं खोदा गया है न ही कोई हैंडपंप हैं। ग्रामीण गांव के बाहर दूर स्थित कुएं से पेयजल लाते हैं या फिर नाले का पानी का उपयोग करते हैं। यह समस्या वर्षों से बनी हुई है।
-सुरपत डोंगरे, ग्रामीण
ग्रामीणों द्वारा दूषित पानी का उपयोग करने के कारण उनमें चर्म रोग, खून की कमी और कुपोषण का शिकार हो रहे हैं। जंगलों के बीच बसे होने के कारण इनमें जागरुकता नहीं है। यहां हमारे द्वारा शिविर लगाकर ग्रामीणों की जांच की गई है।
-डॉ. रमेश सेवलानी, आयुर्वेद चिकित्सक

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