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छत्तीसगढ़ की इस प्राचीन, ऐतिहासिक जगह पर मनाया जाता है देश का पहला देव दशहरा, मां कंकालीन चुराती थी यहां महुआ

पेटेचुआ स्थित मां कंकालीन मंदिर में आज से देव दशहरा उत्सव मनाया जाएगा। मंदिर की परंपरा रही है कि क्वांर नवरात्रि प्रारंभ होने के बाद प्रथम मंगलवार को दशहरा उत्सव (Dashara festival) मनाया जाता है।

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बालोद

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Dakshi Sahu

Oct 01, 2019

छत्तीसगढ़ की इस प्राचीन ऐतिहासिक जगह पर मनाया जाता है देश का पहला देव दशहरा, मां कंकालीन चुराती थी यहां महुआ

छत्तीसगढ़ की इस प्राचीन ऐतिहासिक जगह पर मनाया जाता है देश का पहला देव दशहरा, मां कंकालीन चुराती थी यहां महुआ

बालोद /गुरुर. ग्राम पेटेचुआ स्थित मां कंकालीन मंदिर में आज से देव दशहरा उत्सव (India first Dev Dashara celebrate in Chhattisgarh ) मनाया जाएगा। मंदिर की परंपरा रही है कि क्वांर नवरात्रि प्रारंभ (Navratri Festival in Balod)होने के बाद प्रथम मंगलवार को दशहरा उत्सव मनाया जाता है। दशहरा उत्सव में विभिन्न ग्रामों एवं बस्तर के देवी देवताओं को आमंत्रित किया जाता है। ब्लॉक मुख्यालय से 18 किलोमीटर दूर ग्राम पेटेचुआ में स्थित मां कंकालीन मैया मंदिर (Maa kankalin Temple Balod) भक्तों के लिए आस्था का केन्द्र है। मां कंकालीन मंदिर खारुन नदी (Kharun River Chhattisgarh) का उद्गम स्थल है, जो चारों ओर जंगलों से घिरा हुआ है, जो मन को मोहित करता है। जानकारों ने बताया कि मां कंकालीन धरती चीरकर प्रकट हुई हंै और सिद्धपीठ है। पहले यह मंदिर खुले आसमान के नीचे स्थित था, बाद में मंदिर बनाया गया।

माता के मंदिर की यह है प्राचीन कथा
मां कंकालीन मैया की उत्पत्ति को लेकर मंदिर पुजारी रामकुमार कोमरा ने बताया कि आज से 700 से 800 साल पहले ग्राम पेटेचुआ निवासी बुजुर्ग चिराम मंडावी गांव से दूर जंगल में महुआ बीनने जाते थे। महुआ बीनने के बाद चट्टानी जमीन होने के कारण महुआ को उसी स्थान पर सुखाकर घर चले आते थे। अगले दिन पुन: उसी जगह पर पहुंचने पर सुखाया हुआ महुआ गायब हो जाता था। यह सिलसिला लगातार चलता रहा, जिससे चिराम मंडावी परेशान हो गया। चिराम मंडावी माजरे का पता लगाने रात में उसी स्थान पर रुक गया, जहां उसने महुआ सुखाया था। जब रात हुई तब उसका महुआ अपने आप गायब हो गया, तब चिराम मंडावी ने जोरदार आवाज देकर कहा कि कौन है, जो मेरे महुआ को गायब किया है।

सामने आओ। तब हवा स्वरूप माताजी ने कहा मैं कंकालीन हूं, लेकिन चिराम मंडावी ने यकीन नहीं किया और सामने आने की बात कही। तब जोरदार आवाज आई। मां कंकालीन धरती चीरकर स्वयं प्रकट हुई और बताया कि मैं ही तुम्हारे महुए को गायब करती हूं। यह कहते हुए मां कंकालीन चिराम मंडावी के शरीर में प्रवेश कर गई, जिससे वह मूर्छित हो गया। यह सिलसिला चलते-चलते सुबह हो गई। तब चिराम मंडावी की पत्नी उसे खोजने जंगल गई। उसे चिराम मूर्छित अवस्था में मिला। तब उसने घटना की जानकारी ग्रामीणों को दी। ग्रामीण उसे लेकर गांव आ गए। जहां उसे होश आया और उसने पूरी घटना की जानकारी ग्रामीणों को दी। तब ग्रामीणों ने पत्थर तोड़कर प्रकट हुई मां की पूजा-अर्चना प्रारंभ की। तब से लेकर मां कंकालीन की पूजा-अर्चना की जा रही है।

ऐसे हुआ मंदिर का निर्माण
प्रतिमा खुले आसमान के नीचे था। बाद में झोपड़ीयुक्त मंदिर बनाया गया। मंदिर समिति सचिव छबिलाल कुरैटी, सहसचिव मानसिंह पोया ने बताया कि खप्परयुक्त मंदिर का निर्माण ग्राम चरोटा के ग्रामीणों ने कराया था। ग्राम चरोटा में हैजा फैला हुआ था। ग्राम से प्रतिदिन किसी न किसी ग्रामीण की मृत्यु हो रही थी। तब ग्रामीणों ने ग्राम पेटेचुआ की मां कंकालीन के बारे में सुना और तत्काल ही मां कंकालीन के शरण में आ गए। मां कंकालीन ने उन लोगों की समस्याओं को पलभर में ही दूर कर दिया और हैजा से होने वाली मृत्यु थम गई। तब ग्रामीणों ने मां कंकालीन की शक्ति को समझा और मंदिर का निर्माण कराया।

देव दशहरा में उमड़ती है ग्रामीणों की भीड़
मंदिर में पितृमोक्ष के बाद प्रथम मंगलवार को देव दशहरा उत्सव मनाया जाता है, जो देश का पहला दशहरा है। इसमें हजारों की संख्या में अपनी मन्नतें लेकर श्रद्धालु पहुंचते हैं और मां कंकालीन से अपनी मुरादें मांगते हैं। मंदिर प्रांगण में सुबह से ही भक्तों की भीड़ लग जाती है। देव दशहरा में आसपास के ग्रामीण बाजे-गाजे, डांग-डोरी लेकर पहुंचते हंै। कहते हैं, जो भी सच्चे दिल से मां कंकालीन से मनोकामना करता है मां उसकी मनोकामना जरूर पूरा करती है।

देश की पहली होली भी यहीं मनाई जाती है
कंकालीन मंदिर में देश का प्रथम देव दशहरा मनाने के साथ ही सबसे पहले होलिका दहन भी होता है, जो फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार को माता जी का फाग होता है।

माता के नाम पर अपने गांव का नाम
गांव के नाम को लेकर जानकारों ने बताया कि पहले गांव का नाम ग्राम पेटेचुआ था। मां कंकालीन की स्थापना के बाद से ग्राम का नाम बदलकर कंकालीन पेटेचुआ किया गया, तब से लेकर अब ग्राम को कंकालीन पेटेचुआ के नाम से जाना जाता है।

समिति का किया गठन
ग्राम पेटेचुआ में मां कंकालीन मैया की मूर्ति स्थापना के बाद ग्रामीणों की देखरेख में ही पूजा-पाठ की जाती थी। 1984-85 में समिति का गठन किया गया और मंदिर की देखरेख और निगरानी समिति के सदस्य करने लगे। वर्तमान में 312 तेल ज्योति कलश एवं 79 घी ज्योति कलश स्थापना की गई है।

खारुन नदी का उद्गम स्थल
ग्राम कंकालीन पेटेचुआ का जंगल खारुन नदी का उद्गम स्थल है, जो पेटेचुआ से निकल कर सैंकड़ों ग्रामों की प्यास बुझाते हुए राजधानी रायपुर पहुंचती है। इस नदी का उपयोग सिंचाई के लिए भी किया जाता है।

मंदिर निर्माणाधीन
मां कंकालीन मंदिर को ग्राम चरोटा के ग्रामीणों ने बनाया था, जिसका जीर्णोद्धार कर मंदिर को नया स्वरुप दिया जा रहा है, जो निर्माणाधीन है। मां कंकालीन मंदिर के आसपास बईहा बाबा, माडिय़ा बाबा, राजाराव बाबा, शंकर भगवान, लक्ष्मी-सरस्वती एवं मंदिर के प्रवेश द्वार पर हनुमान की मूर्ति की स्थापना की गई है।

पर्यटन स्थल घोषित करने की मांग
समिति एवं ग्रामीणों ने शासन से ग्राम कंकालीन पेटेचुआ में स्थित मां कंकालीन मंदिर को पर्यटन स्थल घोषित करने की मांग की है, क्योंकि यह मंदिर 700-800 साल से आस्था का केन्द्र है। यहां दूर-दूर से मंदिर दर्शन करने हजारों की सं?या में श्रद्धालु आते है और अपनी मुरादें पुरी करते हैं। पंचमी पर्व पर मां कंकालीन की पूजा पाठ कर विशेष शृंगार किया जाता है। मंदिर प्रांगण में प्रतिदिन माता सेवा पार्टियां भजन गाते हैं। मंदिर समिति के अनुसार 3 अक्टूबर, 6 अक्टूबर हवन, 7 अक्टूबर को शोभा यात्रा निकाली जाएगी।