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प्रवासी बिहारियों की पहचान है आरटी नगर का दशहरा

प्रवासियों की नई पीढ़ी को लोक संस्कृति और परंपरा से जोडऩे में सफल रही है परिषद

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प्रवासी बिहारियों की पहचान है आरटी नगर का दशहरा

बेंगलूरु. आरटी नगर स्थित बिहार भवन प्रवासी बिहारियों की पहचान का प्रतीक है और पिछले कई दशकों से दशहरे के दौरान यहां शंख-घंटे की ध्वनि के बीच देवी दुर्गा की भक्ति की जोत जलती आ रही है। सिद्धार्थ सांस्कृतिक परिषद के तत्वावधान में दस दिनों चलने वाले सार्वजनिक दशहरा महोत्सव में बिहार की लोक संस्कृति जीवंत हो जाती है।

परिषद के अध्यक्ष उदय कुमार बताते हैं कि दुर्गा पूजा सिर्फ मिथ की पूजा नहीं, बल्कि स्त्री की ताकत, सामथ्र्य और उसके स्वाभिमान की एक सार्वजनिक पूजा है। यह सामाजिक प्रेम और सौहार्द बढ़ाने वाला त्योहार है, इसलिए परिषद इसे सार्वजनिक दशहरा महोत्सव कहता है। करीब चार दशक पूर्व कुछ प्रवासी बिहारियों ने दुर्गा पूजा की शुरुआत की थी।

हर वर्ष दशहरा में करीब 15 हजार लोग देवी पूजन करने आते हैं। बिहार ही नहीं पूर्वांचल और झारखंड से भी बड़ी संख्या में लोग देवी आराधना के लिए आते हैं। सचिव अरुण झा बताते हैं कि बेंगलूरु में बिहारी लोक परंपरा के अनुसार दशहरा महोत्सव करने से बिहारियों को विशेष पहचान मिली है।

बिहार भवन और दशहरा महोत्सव आज प्रवासी बिहारियों के लिए गौरव का प्रतीक बन चुका है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में मैथिली, मगही, भोजपुरी, अंगिका, बज्जिका भाषाओं के लोकगीत महोत्सव में आने वाले श्रद्धालुओं को अपनी लोक संस्कृति का अहसास कराते हैं। प्रतिवर्ष प्रकाशित होने वाली स्मारिका 'दैनंदिनीÓ परिषद के मुखपत्र की भांति है।

प्रचार प्रसार मंत्री श्रीकांत शर्मा ने कहा कि चार दशक पूर्व जब वरिष्ठ सदस्य राजेश्वर सिंह, बिजय शंकर सिंह, सीके करुण, रामलखन सिंह, एसएस प्रसाद आदि ने यहां दुर्गा पूजा करने का संकल्प किया था, तब परमेश्वर झा कोलकाता से ट्रेन से देवी प्रतिमा लेकर आए थे। वहीं कुछ लोगों द्वारा शुरू किया गया पूजन आज परिषद के बैनर तले आरटी नगर के विनायक कल्चर सेंटर में हर वर्ष भव्य महोत्सव का रूप लेता है।

हरिश्चन्द्र झा, देवेश चौबे, परमानंद शर्मा, आनंद मोहन झा जैसे अनुभवी सदस्यों के मार्गदर्शन में पारंपरिक वैदिक विधि विधान से पूजा अर्चना होती है। कोषाध्यक्ष रामकिंकर सिंह ने बताया कि परिषद की पूजा से प्रवासी बिहारियों की तीसरी और चौथी पीढ़ी जुड़ चुकी है। दशहरा पूजा का मकसद आने वाली पीढ़ी को जड़ों से जोडऩा ही था।

जिस प्रकार युवा उत्साहपूर्वक इसमें भाग लेते हैं, उससे स्पष्ट है कि परिषद अपने संकल्प में सफल है। पूजा अध्यक्ष केएन झा के नेतृत्व में 10 अक्टूबर से शुरू हुए महोत्सव में 16 अक्टूबर को देवी प्रतिस्थापन एवं लोचन विमोचन का विधान होगा।