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रंगमंच कलाकार डॉ. सुभद्रम्मा और किन्नर मंजम्मा को कित्तूर रानी चेन्नम्मा पुरस्कार

नाडोज उपाधि से पुरस्कृत डॉ. सुभद्रम्मा ने एक और उपलब्धि हासिल की। डॉ. सुभद्रम्मा मन्सूर को महिला दिवस के उपलक्ष्य में राज्य सरकार की ओर से कित्तूर रानी चेन्नम्मा पुरस्कार के लिए चुना गया है।

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रंगमंच कलाकार डॉ. सुभद्रम्मा और किन्नर मंजम्मा को कित्तूर रानी चेन्नम्मा पुरस्कार

रंगमंच कलाकार डॉ. सुभद्रम्मा और किन्नर मंजम्मा को कित्तूर रानी चेन्नम्मा पुरस्कार

बल्लारी. नाडोज उपाधि से पुरस्कृत डॉ. सुभद्रम्मा ने एक और उपलब्धि हासिल की। डॉ. सुभद्रम्मा मन्सूर को महिला दिवस के उपलक्ष्य में राज्य सरकार की ओर से कित्तूर रानी चेन्नम्मा पुरस्कार के लिए चुना गया है।


ंरंगमंच से जुड़ी सुभद्रम्मा मन्सूर ने अपने गीतों व अभिनय से दर्शकों के दिल में जगह बना ली है। रक्तरात्रि नाटक में किरदार निभाने वाली सुभद्रम्मा मन्सूर ने द्रौपदी के किरदार में जान डाल दी। उच्च स्तर पर पहुंची सुभद्रम्मा मन्सूर की राह आसान नहीं थी। गरीबी व कई सामाजिक समस्याओं का सामना करती हुई व हर चुनौतियों को स्वीकार करती हुई रंगमंच क्षेत्र में आगे बढ़ती गई।


उन्हें कन्नड़ व संस्कृति विभाग, अकादमी, निगम, बोर्ड, जिला पंचायत, निगम, साहित्य परिषद, ट्रस्ट, विश्वविद्यालय, मठ सहित कई संगठनों की ओर से सम्मानित किया गया है। इन्होंने कई पुरस्कार, व उपाधि हासिल की है। कला प्रेमियों ने इन्हें गानकोगिले, रंगसिरी, ग्रामीण थियेटर की अभिनेत्री आदि उपाधियों से सम्मानित किया गया।

उन्हें वर्ष १९८६ में कर्नाटक नाटक अकादमी, १९९६ में कर्नाटक राज्योत्सव पुरस्कार, १९९८ में कोट्रप्पगौड़ा पाटील कला पुरस्कार, १९९९ में कनकपुर अखिल भारतीय कन्नड़ साहित्य सम्मेलन पुरस्कार, २००३ में कन्नड़ विश्वविद्यालय की ओर से नाडोज पुरस्कार, २००४ में अमरिका मेें तीसरी अक्क विश्व कन्नड़ सम्मेलन, वर्ष २००५ में मंगलूरु संदेश पुरस्कार, २००५ में इडुवालु एच होन्नय्या समाज सेवा पुरस्कार, वर्ष २००७ में गुब्बी वीरण्णा पुरस्कार, २०१२ में मूडुबिदरे में अल्वास नुडिसिरी पुरस्कार, वर्ष २०१३ में गिरीजा लोकेश से लक्ष्मीबाई पुरस्कार प्राप्त की।

वर्ष २०१३ में चिंदोड़ी लीला पुरस्कार मिला। वर्ष २०१४ में विजयनगर श्री कृष्ण देवराय विश्वविद्यालय ने इन्हें डॉक्टरेट ऑफ आर्ट्स मानद उपाधि से सम्मानित किया। अब राज्य सरकार की ओर से कित्तूर रानी चेन्नम्मा पुरस्कार की घोषणा की गई है।


पुरस्कार स्वीकार करने नहीं गई सुभद्रम्मा: सुभद्रम्मा मन्सूर कहती है वे अब ८० साल की है। केवल १५ घंटे पहले ही उन्हें सूचित किया गया है इस उन्हें पुरस्कार दिया जा रहा है। सुभद्रम्मा का कहना है कि सरकार की ओर से उनकी यात्रा की कोई व्यवस्था भी नहीं की गई है। अपनी व्यथा का बयान करते हुए सुभद्रम्मा मन्सूर ने कहा कि वे पुरस्कार स्वीकार करने नहीं जाएंगी। सप्ताह पहले ही सरकार ने विवरण मांगी थी।

सरकार की ओर से कोई पूर्व जानकारी नहीं दी गई। किसी व्यक्ति ने आकर उन्हें यह सूचना दी कि उन्हें बेंगलूरु में पुरस्कार दिया जाएगा। वृध्दावस्था व उचित प्रबंधन के अभाव के चलते सुभद्रम्मा मन्सूर ने बेंगलूरु जाकर पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया।


किन्नर मंजम्मा को भी पुरस्कार: इस साल जिले के दो कलाकारों तथा एक संस्थान को कित्तूर रानी चेन्नम्मा पुरस्कार की घोषणा की गई है। पुरस्कार पाने वालों में मंजम्मा नामक एक किन्नर भी शामिल है। वर्तमान में कर्नाटक लोक अकादमी सदस्य के रूप में कार्यरत मंजम्मा माता मंजम्मा कहलाती है जो नृत्य तथा गीतों से विख्यात हो चुकी है। रेणुकादेवी किन्नर कलाकारों की टीम बनाकर कई कार्यक्रम प्रस्तुत कर चुकी है।

बल्लारी से देश की राजधानी नई दिल्ली तक जोगती नृत्य (किन्नर नृत्य) से दर्शकों का दिल जीत चुकी है। आकाशवाणी, दूरदर्शन पर कार्यक्रम प्रस्तुत कर चुकी हैं। दसवीं तक पढाई करने के उपरांत १८ साल की उम्र में कालव्वा जोगती (किन्नर) से दीक्षा प्राप्त कर किन्नर के रूप में परिवर्तित हो गई जो बाद में मंजम्मा जोगिती के नाम से जानी जाने लगी। मंजम्मा कहती है कि यह सम्मान उन्हें नहीं बल्कि लोककला को प्राप्त हुआ है। इसका श्रेय जोगती समूह को जाता है।