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सिद्धचक्र विधान महापूजा से रत्नत्रयी महोत्सव का समापन

धर्मसभा

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सिद्धचक्र विधान महापूजा से रत्नत्रयी महोत्सव का समापन

सिद्धचक्र विधान महापूजा से रत्नत्रयी महोत्सव का समापन

बेंगलूरु. वीवी पुरम के सीमन्धर शांति सूरी जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में चल रहा तीन दिवसीय महोत्सव का सिद्धचक्र महापूजा के साथ समापन हुआ। आचार्य देवेंद्रसागर सूरीश्वर एवं मुनि महापद्मसागर की निश्रा में आयोजित सिद्धचक्र पूजन के तहत आचार्य ने कहा कि पूजा का किसी भी धार्मिक व्यक्ति के जीवन में बहुत अधिक महत्व होता है। जैन पंरपरा में पूजा, उपासना का विशेष महत्व है। उपासना में सिद्ध चक्र महामंडल विधान की अधिक महिमा है। यह ऐसा अनुष्ठान है जो हमारे जीवन के समस्त पाप, ताप और संताप नष्ट करता है। आगम ग्रंथों के अनुसार मैना सुंदरी ने सिद्ध चक्र मंडल विधान के आयोजन से कुष्ठ रोग से पीडि़त अपने पति श्रीपाल को कामदेव बना दिया था।
सिद्धों की विशेष आराधना के लिए सिद्धचक्र महामंडल विधान किया जाता है। यह एक ऐसा अनुष्ठान है जो हमारी जीवन के समस्त पाप-ताप और संताप को नष्ट कर देता है, सिद्ध शब्द का अर्थ है कृत्य-कृत्य, चक्र का अर्थ है समूह और मंडल का अर्थ एक प्रकार के वृत्ताकार यंत्र से है, दोनों को मिलाकर ही सिद्धचक्र बनता है। इनमें अनेक प्रकार के मंत्र व बीजाक्षरों की स्थापना की जाती है, उनके मुताबिक मंत्र शास्त्र के अनुसार, इसमें अनेक प्रकार की दिव्य शक्तियां प्रकट हो जाती है, सिद्धचक्र महामंडल विधान समस्त सिद्ध समूह की आराधना मंडल की साक्षी में की जाती है, जो हमारे समस्त मनोरथों को पूर्ण करती है। कोई भी व्यक्ति अपने किसी इष्ट को, अपने किसी देवता को, किसी गुरु को मानता है तो वह उनकी कृपा भी चाहता है। वह चाहता है कि उसके इष्ट, देवता हमेशा उसके साथ रहें, गुरु का उसे मार्गदर्शन मिलता रहे।
इसी कृपा प्राप्ति के लिए जो भी साधना क्रियाएं की जाती हैं, उन्हें पूजा विधि कहते हैं। जिस प्रकार हर काम के करने की एक विधि होती है एक तरीका होता है उसी प्रकार पूजा की भी विधियां होती हैं क्योंकि पूजा का क्षेत्र भी धर्म के क्षेत्र जितना ही व्यापक है। जिस प्रकार गलत तरीके से किया गया कोई भी कार्य फलदायी नहीं होता, उसी प्रकार गलत विधि से की गई पूजा भी निष्फल होती है। जिस प्रकार वैज्ञानिक प्रयोगों में रसायनों का उचित मात्रा अथवा उचित मेल न किया जाए तो वह दुर्घटना का कारण भी बन जाते हैं, उसी प्रकार गलत मंत्रोच्चारण अथवा गलत पूजा-पद्धति के प्रयोग से विपरीत प्रभाव भी पड़ते हैं।