दुनिया के प्रत्येक संप्रदाय में दान को विशेष महत्व दिया जाता है। भारतीय संस्कृति में दान को बेहद पुण्य अनुष्ठान माना जाता है, किंतु दान देने वाले से यह अपेक्षा की जाती है कि उसके भीतर इस भाव का गुमान न हो कि वह सामने वाले की मदद कर रहा है।
बेंगलूरु. दुनिया के प्रत्येक संप्रदाय में दान को विशेष महत्व दिया जाता है। भारतीय संस्कृति में दान को बेहद पुण्य अनुष्ठान माना जाता है, किंतु दान देने वाले से यह अपेक्षा की जाती है कि उसके भीतर इस भाव का गुमान न हो कि वह सामने वाले की मदद कर रहा है। उक्त विचार सुशील धाम में आयोजित बालराई जैन समाज के सम्मेलन में आचार्य देवेंद्रसागर ने व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि विडंबना यह है कि धनी लोग देवी-देवताओं पर तरह-तरह का चढ़ावा चढ़ाते रहते हैं, मंदिरों में कुछ लाख-करोड़ रुपये वे बेहिचक दान कर देते हैं, पर कड़ाके की ठंड में चौराहों पर ठिठुरते बच्चों, भीख मांगती महिलाओं और हाथ फैलाते बुजुर्गों को देखकर उनका दिल नहीं पसीजता।
असलियत में अमीर व्यक्ति धार्मिक आयोजन या कुछ दान-पुण्य करके इस अपराधबोध से मुक्त होने का प्रयास करते हैं कि वे सिर्फ अपने लिए सोचते हैं। दूसरी बात यह कि इन क्रिया-कलापों से समाज में उनका रुतबा भी बढ़ता है। इस दोहरे लाभ पर नजर रखकर किया गया दान वास्तविक दान नहीं है क्योंकि यह और चाहे जो करे दान करने वालों के व्यक्तित्व को ऊंचाई नहीं दे पाता।
आचार्य ने कहा कि समाज में अमीरों के कुछ ऐसे भी उदाहरण मिलते हैं जो अमीर होने के बावजूद जिंदगी के भीतरी अर्थों- शील, सदाचार और मंगल, मैत्री को आत्मसात करते हुए जरूरतमंदों की मदद करने को अहोभाग्य समझते हैं। दानशीलता की भावना एक पारसमणि है जिससे समाज में समदृष्टि का मार्ग प्रशस्त होता है। इस पारसमणि के स्पर्श से ही हमारी आध्यात्मिक उन्नति संभव है।