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महिला आरक्षण के लिए बदलनी होगी ‘पुरुष प्रधान’ मानसिकता

चार दशकों से 33 फीसदी आरक्षण के लिए महिलाओं का संघर्ष अब भी जारी

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महिला आरक्षण के लिए बदलनी होगी ‘पुरुष प्रधान’ मानसिकता

संजय कुलकर्णी
बेंगलूरु. देश में नगरीय निकाय, जिला तथा ग्राम पंचायतों के चुनाव में महिलाओं को आरक्षण मिला लेकिन, लोकसभा तथा विधानसभा में गत चार दशकों से 33 फीसदी आरक्षण के लिए महिलाओं का संघर्ष अब भी जारी है।
कई बार इस विधेयक को राज्यसभा में पारित किया गया है लेकिन अभी तक लोकसभा में मंजूरी नहीं मिली है। राजनीतिक दलों ने इस विधेयक की राह में रोड़े अटकाए हैं। वर्ष 2008 से ही महिला आरक्षण विधेयक मंजूरी के इंतजार में है। देश के 542 सदस्यों वाली लोकसभा में अगर महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण मिलता है तो उनकी संख्या 178 तक पहुंच जाएगी। सोलहवीं लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या केवल 6१ रही। देश में महिला मतदाताओं की संख्या 45 करोड़ होने के बावजूद संसद में उन्हें उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया है।

फिक्र तो अपनी है, कर रहे बहानेबाजी: ललिता
मशहूर कन्नड़ साहित्यकार एवं पूर्व मंत्री बीटी ललिता नायक ने कहा कि राजनीतिक दल बहानेबाजी कर इस विधेयक को लटकाए हुए हैं। कोई पिछड़े समुदाय तो कोई सामाजिक न्याय की बात कर 30 वर्षों से इस विधेयक की राह में रोड़ा अटकाए हुए है। नेताओं को इस बात का डर है कि अगर महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का विधेयक पारित होता है तो कइयों अपनी परंपरागत सीट छोडऩे की नौबत आ जाएगी। इस डर से कई राजनेताओं को महिला आरक्षण की बात गले नहीं उतर रही है। इसलिए इस विधेयक का एक सोची समझी राजनीति के तहत विरोध किया जा रहा है। जैसे ही यह विधेयक सदन में पेश किया जाता है तब इस विधेयक को कई बहाने से लटकाया, अटकाया और भटकाया जाता है।

हर हाल में पारित हो महिला आरक्षण विधेयक : मोटम्मा
इस हकीकत को स्वीकारना होगा की महिलाओं को सत्ता में भागीदारी देने के लिए कोई भी राजनीतिक दल खास कर पुरुष नेता मानसिक रूप से तैयार नहीं है। यह बेबाक राय है पूर्व मंत्री व कांग्रेस की वरिष्ठ नेता मोटम्मा की। उनके मुताबिक सभी राजनीतिक दलों के पुरुषों को महिला आरक्षण से खतरा नजर आता है। इसलिए कोई भी राजनीतिक दल महिला आरक्षण के पक्ष में नहीं है। अभी हाल के आम चुनाव की मिसाल लें तो राज्य की 28 सीटों में राजनीतिक दलों ने कितने महिलाओं को टिकट दिया यह सब जानते हैं। कई क्षेत्रों में महिला मतदाता ही महिला जनप्रतिनिधियों को वोट नहीं देती है। महिला मतदाता भी परिवार के मुखिया या उसके पति भाई के निर्देशों पर ही मत देती है। इसलिए महिला जनप्रतिनिधियों को चुनाव जीतने के लिए पार्टी पर ही निर्भर होना पड़ता है। इस स्थिति को बदलने के लिए हर हालत में महिला अराक्षण विधेयक पारित होना चाहिए।

राजनीतिक दलों में इच्छा शक्ति ही नहीं: लीलादेवी
महिला आरक्षण विधेयक के लिए संघर्ष करके मैं थक गई हूं। यह कहना है पूर्व मंत्री व जनता दल-एस की नेता लीलादेवी आर. प्रसाद का। उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण विधेयक संसद में सबसे अधिक समय तक लंबित रहने वाला विधेयक है। यह कटु सत्य है कि किसी भी राजनीतिक दल में महिला आरक्षण विधेयक का समर्थन करने की इच्छा नहीं है। जब तक महिलाएं निर्णायक पदों पर आसीन नहीं होती है तब तक इस विधेयक को पारित किए जाने की कोई संभावना नजर नहीं आ रही है। वर्ष 1996 में इस विधेयक को पारित करने की मांग को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवेगौडा के साथ मुलाकात की थी। लेकिन, प्रयास विफल रहा।

विरोध का साहस नहीं मगर, पारित नहीं होने देते: प्रमिला
शहर की मशहूर अधिवक्ता व पूर्व विधायक भाजपा की नेता प्रमीला नेसर्गी के मुताबिक महिला आरक्षण विधेयक का सबसे बड़ा अवरोधक राजनीतिक दलों के पुरुष नेताओं में व्याप्त डर है। इन नेताओं को लगता है कि महिला आरक्षण विधेयक पारित होने के बाद क्षेत्र में उनकी अहमियत कम हो जाएगी। कई नेताओं को उनका स्थान छोडऩा पडेगा। इस मानसकिता के कारण इस विधेयक को लेकर आम सहमति नहीं बन रही है। किसी भी राजनीतिक दल में इस विधेयक का सार्वजनिक रूप से विरोध करने का साहस भी नहीं है। लेकिन, सभी दल इस विधेयक को पारित नहीं होने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहें है।

महिलाओं का संगठित संघर्ष जरूरी: जयश्रीदेवी
राज्यसभा की पूर्व सदस्य मशहूर नाटक कलाकार बी.जयश्रीदेवी के मुताबिक महिलाओं को राजनीति में लाने के लिए प्रेरित करना आसान नहीं है। अभी तक यह देश पुरुष प्रधान रहा है। सभी राजनीतिक दलों में महिला प्रकोष्ठ स्थापित किया गया है। सभा समारोह में महिला सदस्यों को भीड़ इकट्ठा करने के लिए बुलाया जाता है लेकिन जब सत्ता में हिस्सेदारी की बात आती है तो सभी राजनीतिक दल बगलें झांकने लगते हैं।हर क्षेत्र में महिला मतदाताओं की संख्या लगभग 50 फीसदी होती है। ऐसे मे कोई भी राजनीतिक दल महिला मतदाताओं की अनदेखी नहीं कर सकता है। लिहाजा महिला आरक्षण विधेयक मंजूर करने के लिए भी देश की महिला मतदाताओं को संगठित संघर्ष करना होगा।

कुशल प्रशासक साबित किया है महिलाओं ने: जयमाला
महिला एवं बाल विकास मंत्री जयमाला के मुताबिक महानगर पालिका, नगरीय निकाय, जिला, तहसील तथा ग्राम पंचायतों में महिला आरक्षण लागू करना संभव हुआ है। यहां की महिला जन प्रतिनिधि अपना दायित्व बखूबी निभा रही हंै। ऐसे में लोकसभा तथा विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण देने पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। महिलाओं ने साबित कर दिया है की वो भी एक कुशल प्रशासक हैं। बेंगलूरु महानगरपालिका में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण देने के कारण आज यहां 100 से अधिक महिला पार्षद हंै। कई महिला पार्षदों ने महापौर, उपमहापौर तथा विभिन्न स्थाई समिति के अध्यक्ष पद का दायित्व संभाला है। इस विधेयक को पारित करने के लिए सभी राजनीतिक दलों के पुरुष राजनेताओं को उनकी मानसिकता बदलनी होगी। इस मानसिकता को बदलने से ही महिलाओं की सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित होगी।

बात तभी बनेगी जब आरक्षण मिलेगा: राणी सतीश
पूर्व मंत्री तथा कांग्रेस की वरिष्ठ नेता राणी सतीश के मुताबिक राजनीतिक व्यवस्था ही ऐसी है जिसमें महिलाओं को सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए कानून का सहारा लेना पड़ेगा। अगर कोई लोकसभा क्षेत्र महिलाओं के लिए आराक्षित होगा तभी राजनीतिक दल उस क्षेत्र के लिए महिला प्रत्याशियों को तलाशेंगे। वर्ना किसी महिला को टिकट मिलना आसान नहीं है। अगर राजनीतिक दलों को 33 फीसदी आरक्षण अधिक लगता है तो शुरुआत 15-20 फीसदी से भी हो सकती है। लेकिन, अगर इच्छा शक्ति नहीं होगी तो इस विधेयक का विरोध करने के लिए सौ बहाने मिल जाएंगे। कई लोग महिलाओं की प्रशासनिक क्षमता नहीं होने की बाते करते है। अभी जो महिला जनप्रतिनिधि जिला पंचायत, तहसील पंचायतों में कार्यरत हैं वैसी महिलाओं को विधानसभा में मौका दिया जा सकता है।