
दावानल के खतरे में 846 हैक्टेयर का सागवान का जंगल
बांसवाड़ा.सरेड़ी बड़ी. कस्बे के चारों ओर फैले 846 हेक्टेयर सागवान से जंगल पर दावानल का खतरा मंडरा रहा है। वन विभाग एवं सरकार की इच्छाशक्ति के अभाव में वन क्षेत्र असुरक्षित है और कोई इस ओर ध्यान नहीं दे रहा। सूत्र बताते हैं कि होली के बाद गर्मी का दौर शुरू होने के साथ यहां हर बार दावानल की शिकायत रही है। इसकी आड़ में पूर्व में जंगल का हिस्सा साफ कर कब्जा करने एवं लकड़ी चुराने की गतिविधियां सामने आती रही हैं। हालांकि इस क्षेत्र में हाल के दिनों में लकड़ी की अवैध कटाई या वनभूमि पर कब्जों के मामले सामने नहीं आए हैं, लेकिन क्षेत्र में जब-तब उठने वाली आग की लपटें और इनसे निबटने में वन विभाग अक्षम प्रतीत होने से जंगल का भविष्य संकट में है। दरअसल, हकीकत यह भी है कि यहां आग लगने पर नियंत्रण के लिए वन नाके पर स्टाफ भी गिनती का है, जबकि जंगल का परिक्षेत्र काफी विशाल है। ऐसे में जब निगरानी ही जैसे-तैसे हो रही है तो आग लगने पर काबू पाना मुश्किल ही है। इसके चते जब-तब आग लगने पर लेंटाना यानी कंटीली झाडिय़ों और सूखे पेड़ों-पत्तों के साथ सागवान के हरे पेड़ स्वाह हो रहे हैं, वहीं इस इलाके के वन्य जीव भी खत्म हो रहे हैं। यहां पैंथर, नीलगाय, खरगोश, जरख, लोमड़ी के अलावा सरिसर्पों का बसेरा रहा है, जिनका जीवन दावानल के चलते संकट में आ रहा है। ऐसे में इस जंगल को 30 किलोमीटर की पक्की चारदीवारी की दरकार है। माखिया वन नाका चौकी प्रभारी रघुनाथसिंह ने बताया कि गर्मी में जंगल में उठता धुंआ आए दिन परेशान करता रहा है। आसपास ग्रामीणों के सहयोग आग बुझाते हैं। जंगल के अंदर पानी की सुविधा संभव नहीं है। अग्निशमन यंत्र भी नहीं पहुंच पाते। ऐसे में फायरलाइन डालना ही विकल्प रहा है।
इनका कहना है
जंगल की सुरक्षा के लिए चारदीवारी बनाने के प्रस्ताव लगातार भेजे हैं। मंजूरी मिलने पर यह काम संभव है। जंगल के क्षेत्र में फायरलैन विकसित करके दावानल पर आग काबू करने की जद्दोजहद से बचा जा सकता है। अग्निशमन की सुविधाएं भी स्टाफ को मिलनी जरूरी है, लेकिन यह वर्तमान में नहीं है।
कुलदीपसिंह , क्षेत्रीय वन अधिकारी, गढ़ी
Published on:
31 Mar 2022 01:17 am
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