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राजस्थान में कुपोषण का ऐसा भयावह दृश्य… मां की कोख से मौत तक संघर्ष, संघर्ष और सिर्फ संघर्ष

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banswara

राजस्थान में कुपोषण का ऐसा भयावह दृश्य... मां की कोख से मौत तक संघर्ष, संघर्ष और सिर्फ संघर्ष

बांसवाड़ा. यूं तो इंसानी जीवन का दूसरा नाम ही संघर्ष और मेहनत है। कइयो को संघर्ष वैभव देता है तो कइयों को सफलता के सोपान चढ़ाता है लेकिन इस आदिवासी अंचल में हजारों हजार लोग हैं, जिनका मां की कोख से शुरू हुआ जिंदगी का संघर्ष मौत पर जाकर ही थमता है। उनका संघर्ष सिर्फ और सिर्फ जिंदगी की गाड़ी किसी तरह खिंचने के लिए होता है। बस दो वक्त की रोटी मिल जाए। उनके संघर्ष से न वैभव आता न कोई सीना चौड़ा हो जाने जैसी सफलता। गरीबी और अभावों के बीच सरकार और प्रशासन की मदद और योजनाएं अगर थोड़ा भी कुछ सहारा बनती तो इनका जीवन भी औरों की तरह संघर्षों की गाथाएं लिखता। ऐसा ही नजारा बांसवाड़ा के गांवों में आजादी के बाद से देखने को मिल रहा है। आजादी के 70 साल बाद भी जिले के गांवों में रहने वाले लोग अभावों का जीवन गुजारने को मजबूर हैं। कभी पानी का संकट तो कभी पेट भरने का। कई गांवों में तो बिजली और सडक़ दूर की कौड़ी बने हुए हैं। ग्रामीणों के इस कठिन जीवन को लेकर एक परिवार को केन्द्रित कर तैयार की गई लाइव रिपोर्ट -

जन्म लेते ही कुपोषण का दर्द
छोटी सरवन के पास एक गांव के टापरे में एक बच्चा, जो देख रहा है, समझ रहा है पर शरीर इतना सक्षम भी नहीं कि घर में ही इधर से उधर जा सके। मां या कोई परिजन उठा ले तो सही, नहीं तो काफी देर तक उसी जगह पड़े रहना उसकी मजबूरी। यह हाल उन बच्चों के नहीं जिनकी कम कम उम्र उनके लिए बाधा बनी हो। बल्कि उन बच्चों के हैं जो चलने फिरने उछल-कूद करने की उम्र तो पा चुके, लेकिन कुपोषण ने उन्हें इतना जकड़ रखा कि उनका शरीर साथ नहीं दे पाता। बच्चों में कुपोषण के यह हाल कमोबेश पूरे जिले के गांवों में हैं और यही कुपोषण बांसवाड़ा के ग्रामीण अंचल के लोगों के जीवन का प्रथम संघर्ष है।

मालिक भी मजदूर भी
सवाल: रोटी कितनी देर में बनाओगी?
जवाब: अभी तो यह काम कर रही हूं, फिर आटा भी लाना है। उसके बाद ही कुछ हो सकेगा। पति के सवाल का जवाब देकर महिला फिर पति के साथ टापरे के बाड़े को सुधारने में जुट गई। बारिश में टापरे की सुरक्षा के लिए आंख खुलते ही बाड़े के मरम्मत कार्य में जुटे पति-पत्नी ही घर के मालिक हैं। लेकिन ईंट पर ईंट रख दूसरों का आशियाना तैयार करने वाले ये श्रमिक खुद के मकान के लिए श्रमिक ही हैं। पैसों के अभाव में जिन्हें भूखे पेट काम कर खुद के टापरे को सुधारना पड़ता है। उसके बाद पेट भरने के लिए काम पर जाना भी जरूरी है। अपना काम स्वयं करना चाहिए। यह सही भी है। इससे इससे इंसान परिपक्व और स्वावलंबी होता है। लेकिन खुद के कार्यों को यदि मजबूरी वश किया जाए तो समस्या होना लाजमी है।

यहां भी जद्दोजहद
आज भी गांवों में हालात ऐसे हैं कि लोगों को मोबाइल चार्ज करने और आटा पिसाने तक के मामूली काम करने के लिए 10-10,15-15 किमी दूर जाना पड़ता है और यह काम उनकी पूरे दिन की दिहाड़ी मारता है सो अलग।

सूर्योदय से पहले शुरू होते हैं जतन
सूरज उगने के साथ संघर्ष का बिगुल बज उठता है। महिला ने पानी की जरूरत को पूरा करने के लिए दोनों हाथों में कलशे उठा लिए और निकल पड़ी ताकि घर के दूसरे सदस्यों की प्यास बुझा सके। घर से आधा से एक किमी दूर जल स्त्रोत तक जाना और पानी लाना ही उसके लिए संघर्ष विराम नहीं है। फिर पानी लाने का यही क्रम घर के अन्य सदस्यों का भी है, जो दिन में कई बार पानी लाने के इस कार्य को दोहराते हैं।

...माथे पर पेट भरने का तनाव
सवाल: आपके पति कहां हैं? आप के बच्चे?
जवाब: पति काम पर गए है और मेरी दो बेटियां 13 और 10 साल की मजदूरी करने के लिए गई। बाकी ये छोटे बच्चे यहीं घर पर हैं। यह शब्द उस महिला के हैं, जो बारिश से बचने के लिए उसके टापरे की छत को संभालने में जुटी थी। बातों-बातों में उसने एक-एक कर परिवार के प्रत्येक सदस्यों के संघर्ष की कहानी बयां कर दी। 9 साल की मानसिक बीमार बच्ची और 3 छोटे बच्चों की देखरेख में दिन गुजारने और घर के सारे कार्य निपटाने सहित बाहर के कामों को करने वाली इस ग्रामीण महिला ने बताया कि पेट भरने के लिए घर के तीन लोग मजदूरी करने जाते हैं। बेटियां छोटी हैं फिर भी उन्हें काम पर भेजना मजबूरी है। कुछ माह पहले तक मैं भी जाती थी, लेकिन बच्चों के कारण मैंने जाना बंद कर दिया।


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