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बांसवाड़ा : खेती के अलावा नहीं कोई रोजगार, घर-परिवार भगवान भरोसे छोडकऱ परदेस पलायन को मजबूर लोग

मवेशी-खेती भगवान भरोसे, कई घरों में बच्चे बुजुर्गों के आसरे

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बांसवाड़ा. ये तो महज दो उदाहरण हैं अन्यथा जिले में ऐसे सैकड़ों परिवार हैं, जिनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है और वे घरों पर ताले लटकाकर गुजरात और महाराष्ट्र पलायन कर गए हैं। आजादी के 70 साल बाद भी जिले के कुशलगढ़, सज्जनगढ़, गागांगड़तलाई, आदि दूरस्थ इलाकों में बसे लोगों के पास खेती के अलावा रोजगार का कोई साधन नहीं है। असिंचित क्षेत्र होने से खेती भी वर्षा पर निर्भर है और खेत वीरान होने पर पलायन पर ही परिवार का भरण पोषण टिका है।

15 पंचायतों में भयावह स्थिति
कुशलगढ़ क्षेत्र के घाटा क्षेत्र की 17 पंचायतों के करीब 65 से 70 फीसदी परिवार मकानों को बंद कर पलायन कर गए हैं। इसमें भी खंूटा, कुण्डिया, कोटड़ा, तलाईपाड़ा, डेटकिया, बड़लीपाड़ा, जोगड़ीमाल, बालावाड़ा, बड़ला, खजूरा, बालासुरा, भिलिया, बांसड़ी आदि गांवों में 90 फीसदी घरों में ताला लग चुका है।

मवेशी रामभरोसे
कोटड़ा ग्राम पंचायत का तलाईपाड़ा गांव की पन्ती को अपने पति की मौत के बाद पांच पुत्र-पुत्रियों का पेट भरने के लिए अहमदाबाद मजदूरी के लिए जाना पड़ा है। घर पर ताला लगा है। मवेशी रामभरोसे है और खेतों में वीरानी छाई हुई है।

अहमदाबाद कूच
कुशलगढ़ क्षेत्र की कोटड़ा राणगा पंचायत का जोगड़ीमाल गांव। गांव के गोरसिंग के घर की आर्थिक हालत बहुत खराब थी। घर में फाकाकशी के हालात पैदा होने लगे तो परिजनों की नसीहत पर उसने घर-बार छोड़ कर अहमदाबाद की ओर कूच किया। घर की सुरक्षा के लिए चारों तरफ कांटों की बाड़ लगाकर ताला लटका दिया।

इन स्थानों के लिए पलायन
जिले से करीब 90 फीसदी लोग गुजरात के सूरत, अहमदाबाद, गांधीनगर, जामनगर, वापी, दमन, वलसाड़ रोजगार के लिए पलायन करते हैं, वहीं शेष 10 फीसदी लोग महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और राजस्थान के कुछ जिलों में पलायन करते हैं।

मनरेगा: लाखों परिवार पंजीकृत, रोजगार 31 हजार को
जिले में मनरेगा के तहत 3 लाख 84 हजार 392 परिवार पंजीकृत हैं एवं इसमें से 3 लाख 36 हजार 32 को जॉब कार्ड जारी किया हुआ है, लेकिन वर्तमान में केवल 31 हजार 275 परिवारों को ही रोजगार दिया हुआ है। इसमें से भी अधिकांश श्रमिक व्यक्तिगत लाभ की योजना में कार्य कर रहे हैं।

इनका कहना है
इस क्षेत्र में प्रवासी श्रमिकों के लिए कार्य करने वाली संस्था आजीविका ब्यूरो के जवानसिंह के मुताबिक पहले तो साल में कुछ माह के लिए परिवार रोजगार के लिए बाहर जाते थे, लेकिन अब कई-कई माह तक वापस नहीं लौटते। इससे गांवों में वीरानी से छाई हुई नजर आती है। प्रोग्राम मैनेजर कमलेश शर्मा ने बताया कि पलायन रोकने के लिए सरकार की ओर से कोई योजना नहीं बनाई गई है।

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