
सागवाड़ा पत्रिका. कान्हडदास धाम बड़ा रामद्वारा में शाहपुरा धाम के रामस्नेही संत कीर्ति राम महाराज ने कहा कि सत्संग आत्मा के जागरण का माध्यम है। यह केवल वचन-श्रवण नहीं, अपितु चेतना का परिष्कार है। सत्संग वह दिव्य प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति का बाह्य व्यक्तित्व नहीं, बल्कि उसका अंतरंग रूपांतरित होता है। सत्पुरुषों के सान्निध्य में साधक के भीतर सहजता, सरलता और निष्कपटता का उद्भव होता है। उसका हृदय निर्मल जलधारा के समान स्वच्छ हो जाता है, जिसमें आत्मा का प्रतिबिंब स्पष्ट दिखाई देने लगता है। संत ने कहा कि सत्संग के बिना विवेक की उत्पत्ति नहीं होती और ईश्वर की कृपा के बिना सत्संग भी दुर्लभ है। सत्संग केवल साधन नहीं, अपितु स्वयं ईश्वरीय अनुग्रह का प्रत्यक्ष स्वरूप है। सत्संग जीवन का कल्पवृक्ष है, जिसकी छाया में बैठकर साधक अपनी समस्त आध्यात्मिक अभिलाषाओं की पूर्ति कर सकता है। गोस्वामी तुलसीदास के दोहे का उल्लेख करते हुए बताया कि ‘एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध। तुलसी संगत साधु की, हरे कोटि अपराध’। अर्थात थोड़े से भी समय का सत्संग असंख्य पापों का नाश कर देता है। उन्होंने कहा कि सत्संग वह दिव्य औषधि है जो जीवन के विषाद, क्लेश और मोह का शमन करती है। यह अज्ञान के अंधकार को समाप्त कर मनुष्य को उसकी सुप्त संभावनाओं से परिचित कराकर उत्कर्ष के पथ पर अग्रसर करती है। प्रवक्ता बलदेव सोमपुरा ने बताया कि सत्संग में ‘सांसा री डोरी मारे मनडे री मालाए मनडे री माला मारे मन में फिरे’ भजन पर भक्त झूम उठे। संत प्रसाद विष्णु सेवक परिवार की ओर से रहा। सत्संग में भारत शर्मा, भूरा प्रजापत, विजय पंचाल, रमेश सोनी, देवीलाल सोनी, विष्णु प्रजापत, सुरेंद्र शर्मा, नाथू परमार उपस्थित रहे।
Updated on:
27 Jul 2026 06:00 am
Published on:
27 Jul 2026 06:00 am
