
बांसवाड़ा शहर के सभी जलाशयों पर फैली जलकुंभी की चादर, प्रकृति के उपहार की किसी को नहीं कदर
बांसवाड़ा. पानी को ‘अमृत’ तुल्य माना जाता है। कहते हैं कि जल बिन सब सून, जल है तो कल है। प्रकृति और भगवान ने वागड़ को पानी की बहुतायत दी है, लेकिन इसे सहेज कर रखने के मोर्चे पर हम विफल साबित हो रहे हैं। बांसवाड़ा शहर के चारों तरफ जलाशय हैं, लेकिन हम एक भी जलाशय को सजा- संवार कर रख नहीं पा रहे हैं और इन दिनों ये जलाशय जलकुंभी के साम्राज्य की आगोश में हैं। जलकुंभी और प्रदूषण इनमें समाते रहे तो फिर जलाशय इंसान का साथ कैसे दे पाएंगे। फिर कैसे यहां पर्यटक आएंगे और कैसे शहरवासी सुबह और शाम इनके किनारे बैठकर समय बिताएंगे।
अन्यथा जलाशय तो वह आकर्षण है कि लोग खिंचे चले आते हैं और यह देखने के लिए कहीं ज्यादा दूर नहीं उदयपुर ही चले जाएं। फतहसागर झील शाम ढलते पर्यटकों और शहरवासियों की आवाजाही से जीवंत हो उठती है। बांसवाड़ा के जलाशयों को भी ऐसी कद्र की प्रतीक्षा है। सुना है कि जल संरक्षण को लेकर मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान के तहत जिले में 459 कार्यों पर करीब तीन करोड़ रुपए बहाए गए हैं लेकिन शहर के इन जलाशय परी किसी की नजरें इनायत नहीं हुई। ये अपनी दुर्दशा पर आंसू ही बहा रहे हैं, कभी कभार फौरे प्रयास हुए लेकिन बाद में वही ढाक के तीन पात।
मत्स्य आखेट भी धड़ल्ले से
कागदी जलाशय में रही-सही कसर मछली पकडऩे वाले पूरी कर रहे हैं। यहां दिन में धड़ल्ले से मत्स्याखेट चलता रहता है। अवैध रूप से मछली पकडऩे वाले अपने जाल बिछाते हैं। इन्हें कोई रोकने-टोकने वाला नहीं। जिला मुख्यालय पर कागदी के अलावा डायलाब, नाथेलाव, लोधा में भी जलकुंभी का साम्राज्य है।
यह रही जल संरक्षण की बानगी
कागदी पिकअप का नाम जुबां पर आते ही नजरों के सामने मनोहारी प्राकृतिक छटा और हिलोरे लेता जलाशय दिखाई देने लगता है। हरियाली की काई कमी नहीं लेकिन जलाशय के रखखाव पर किसी का ध्यान नहीं है। जलाशय जलकुंभी की चपेट में है। जबकि यह जलाशय पूरे शहर का करता है कंठ तर कर रहा है। जलकुंभी का साम्राज्य दिनों दिन बढ़ रहा है और इस पर अंकुश नहीं लगा तो ये पूरे जलाशय को अपनी चपेट में ले लेगी।
Published on:
02 Nov 2018 02:32 pm
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