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विश्व दुग्ध दिवस विशेष: दूध उत्पादन में अग्रणी बांसवाड़ा संकलन में पिछड़ा, सहकारी डेयरी की बजाय गुजरात जा रहा दूध

लाखों की लागत का प्रोसेसिंग प्लांट भी बंद

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banswara

विश्व दुग्ध दिवस विशेष: दूध उत्पादन में अग्रणी बांसवाड़ा संकलन में पिछड़ा, सहकारी डेयरी की बजाय गुजरात जा रहा दूध

बांसवाड़ा. पशुपालन की दृष्टि से समृद्ध बांसवाड़ा दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में भी अग्रणी है, लेकिन निजी दुग्ध उत्पादक समितियों से चल रही प्रतिस्पद्र्धा में सहकारी दुग्ध उत्पादन संघ लगातार पिछड़ता जा रहा है। कुछ वर्षों पहले तक प्रतिदिन हजारों लीटर दुग्ध का संकलन करने वाला बांसवाड़ा दुग्ध उत्पादन सहकारी संघ अब पशुपालकों और दुग्ध उत्पादकों पर निर्भर होकर रह गया है। जिले का अधिकांश दूध मध्यप्रदेश और गुजरात की निजी डेयरी में जा रहा है। वहीं दूसरी ओर लाखों की लागत का संघ का प्रोसेसिंग प्लांट वर्षों से बंद पड़ा है। एक अनुमान के अनुसार जिले में प्रतिदिन डेढ़ से दो लाख लीटर दूध का उत्पादन होता है, लेकिन अधिकांश दूध निजी डेयरी ले जाती है। इसका प्रमुख कारण यह है कि गुजरात व मध्यप्रदेश की निजी दूध डेयरी इसका दाम सहकारी दुग्ध संघ की दर के मुकाबले अधिक देती है। इसके कारण पशुपालक लाभ देखते हुए सीधे निजी डेयरी को ही दूध दे रहे हैं। बताया जाता है कि करीब 30 से 40 हजार लीटर दूध तो सिर्फ गुजरात जा रहा है।

सिमटता गया आंकड़ा
दुग्ध संघ बांसवाड़ा जिले में एक दशक पहले तक दूध का संकलन करीब 40 हजार लीटर तक होता था, लेकिन निजी डेयरियों के आने और दर अधिक देने से दुग्ध उत्पादकों का रुझान संघ के प्रति कम होता गया। वर्तमान में जिले के 107 गांवों से मात्र साढ़े सात हजार लीटर दुग्ध का संकलन हो रहा है। दुग्ध संकलन में गिरावट का असर 17 मार्च 1986 में शुरू हुए दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड पर भी पड़ा। इसके कारण यहां लाखों रुपए की लागत से लगाया गया प्रोसेसिंग प्लांट लंबे अरसे से बंद पड़ा है। इसके चलते प्लांट परिसर की रौनक भी खत्म हो गई है और चंद कमरों में चलने वाले कार्यालय के अतिरिक्त पूरे परिसर में सन्नाटा पसरा रहता है।

....और इधर ‘दूध वाला गांव’
जहां एक ओर दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड दूध को तरस रहा है, वहीं दूसरी ओर शहर से सटा गांव निचला घंटाला ‘दूध वाला गांव’ बन गया है। निचला घंटाला गांव में करीब 350 घर गुर्जर समाज के हैं और सभी परिवार दुग्ध व्यवसाय से जुड़े हैं। इस गांव की भोर पशु सेवा और दूध से ही होती है। तडक़े से ही महिलाएं अपनी गाय-भैंसों को चारा-पानी देने के साथ दूध निकालने में जुट जाती हैं। दूध निकलने के बाद पुरुष वर्ग संग्रहण केंद्र और शहर में दुग्धापूर्ति के लिए रवाना हो जाते हैं। गांव के मणिलाल गुर्जर बताते हैं कि शहर में निजी आवासों में दूध की आपूर्ति दोपहर तक हो पाती है। इसके बाद घर और खेती का काम देखने के बाद शाम को फिर दूध की आपूर्ति को निकल जाते है। उन्होंने कहा कि करीब पांच हजार लीटर दूध गांव में होता है। इसमें अधिकांश शहर में और समाज के लोगों की ओर से संचालित डेयरी के माध्यम से विक्रय होता है। उनका कहना है कि दुग्ध व्यवसाय और पशुपालन से समाज का आर्थिक स्तर ऊंचा उठा है और समाज का युवा वर्ग भी इसे अपनाने लगा है, जो भविष्य के लिए सुखद संकेत है।


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