
बदायूं। सहसवान-रामपुर संगीत घराने की परंपरा ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को देश ही नहीं, दुनिया भर में पहचान दिलाई है। इसी समृद्ध परंपरा की एक बड़ी कड़ी रहे उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान, जिनकी शिष्य परंपरा में हिंदी सिनेमा की दिग्गज गायिका आशा भोसले का नाम भी सम्मान से लिया जाता है। बताया जाता है कि आशा भोसले ने उनसे शास्त्रीय संगीत की बारीकियां सीखीं और उसी साधना ने उनकी गायकी को असाधारण विस्तार दिया। उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान को पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था, जबकि उनका निधन जनवरी 2021 में हुआ था।
आशा भोसले भले ही बदायूं न आई हों, लेकिन सहसवान घराने से उनका जुड़ाव इस इलाके के लिए हमेशा गौरव का विषय रहा। उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान के शागिर्दों में आशा भोसले के अलावा सोनू निगम, ए.आर. रहमान, हरिहरन और शान जैसे कई बड़े नाम शामिल रहे हैं। यही वजह है कि आशा भोसले के निधन को सिर्फ फिल्म संगीत की क्षति नहीं, बल्कि सहसवान घराने की शिष्य परंपरा के लिए भी बड़ा आघात माना जा रहा है। 12 अप्रैल 2026 को मुंबई में 92 वर्ष की आयु में उनके निधन की खबर आने के बाद देशभर में शोक की लहर फैल गई।
आशा भोसले की आवाज में गाया गया सदाबहार गीत झुमका गिरा रे, बरेली के बाजार में आज भी बरेली की सांस्कृतिक पहचान का सबसे चमकदार प्रतीक माना जाता है। 1966 की फिल्म मेरा साया के इस गीत को संगीतकार मदन मोहन ने स्वरबद्ध किया था और इसे अभिनेत्री साधना पर फिल्माया गया था। दशकों बाद भी यह गीत लोगों की जुबान पर उतनी ही ताजगी से मौजूद है, जितना अपने दौर में था। इसी गीत ने बरेली को देशभर में एक अलग पहचान दी और शहर को ‘झुमका सिटी’ के रूप में लोकप्रिय बना दिया। करीब पांच दशक बाद बरेली ने भी इस सांस्कृतिक विरासत को सार्वजनिक रूप से अपनाया और शहर में विशाल झुमका स्थापित कर उस गीत को अपनी पहचान का हिस्सा बना लिया। यह सिर्फ एक फिल्मी गीत नहीं रहा, बल्कि बरेली की भावनात्मक और सांस्कृतिक छवि का प्रतीक बन गया। ऐसे में आशा भोसले का निधन बरेली के लिए भी निजी क्षति जैसा महसूस किया जा रहा है, क्योंकि उनकी आवाज ने इस शहर को वह पहचान दी, जिसे समय भी फीका नहीं कर सका।
सहसवान घराने से जुड़े संगीतकारों और कलाकारों ने आशा भोसले के निधन पर गहरा दुख जताया है। पद्म भूषण से सम्मानित स्वर्गीय उस्ताद निसार हुसैन खां के पौत्र मुज्तबा हसन खां ने इसे संगीत जगत के लिए अपूरणीय क्षति बताया। उनका कहना है कि आशा भोसले जैसी आवाजें सिर्फ पीढ़ियां नहीं बनातीं, बल्कि परंपराओं को लोकप्रिय संस्कृति से जोड़कर अमर कर देती हैं। सहसवान घराने की साधना, उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान की तालीम और आशा भोसले की बहुरंगी गायकी—इन तीनों ने मिलकर भारतीय संगीत को ऐसी विरासत दी है, जिस पर आने वाली पीढ़ियां भी गर्व करेंगी। उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान के राष्ट्रीय सम्मानों और उनकी व्यापक शिष्य परंपरा को देखते हुए यह संबंध संगीत इतिहास में विशेष महत्व रखता है।
Updated on:
12 Apr 2026 03:48 pm
Published on:
12 Apr 2026 03:46 pm
