
female nurses serving like soldier in barmer
बाड़मेर। थार के रेगिस्तान में दुरुह व दुर्गम इलाके में लू के थपेडे़ सहना मुश्किल हो रहा है वहां महिला नर्सेज सैनिक की भूमिका में सेवाएं दे रही हैं। यहां ऊंट पर लोगों का उपचार करने जाना और साधन न हो तो पैदल चलकर भी ये महिलाएं पहुंचती हैं। घर परिवार से दूर रहकर कार्यरत इन महिलाओं के कारण सीमावर्ती गांवों में जच्चा-बच्चा सुरक्षित हैं।
जिले के शिव ,रामसर और गडरारोड इलाके के कई गांवों में आज भी आने-जाने को साधन नहीं हैं। लोग ढाणियों व रेतीले टीलों पर बसे हैं जहां ऊंट से ही आना-जाना होता है। यहां हारी- बीमारी में नर्सिंगकर्मियों को जाना होता है। दुरूह गांवों में रहने वाली इन महिला नर्सेज की ड्यूटी किसी सैनिक से कम नहीं है। वे प्रतिकूल परिस्थितियों में यहां रहती हैं।
पति रहते हैं साथ
इन नर्सिंगकर्मियों में बड़ी संख्या में एेसी महिलाएं हैं जिनके पति उनके साथ रह रहे हैं। परिवार से दूर हैं और उनका नौकरी करना भी जरूरी है। एेसे में पति को साथ में लेकर रह रही हैं। पति यहां पर अन्य कार्य करते हैं या छिपी बेरोजगारी सहते हैं।
यहां सेवा देने पर लगता है कि मानवता का कार्य कर रहे हैं। महिलाओं के लिए बीमारी में उपचार का अन्य कोई सहारा नहीं है।
सुशीला, नर्स, बीजावल
बॉर्डर के इस इलाके में वास्तव में सैनिक की भूमिका ही है,लेकिन यहां सेवा देने पर तसल्ली है कि महिलाओं की सेवा के लिए कुछ कर रहे हैं।
मंजूबाई, नर्स, नवातला
सीमाक्षेत्र के लिए वरदान
नर्सिंगकर्मियों का सीमावर्ती इलाके में कार्य करना वरदान है। जहां अन्य सरकारी कार्मिक अपडाऊन करते हैं और बॉर्डर के गांव में रहना पसंद नहीं करते, ये महिलाएं तमाम विपरीत परिस्थितियों में यहीं पर रहती हैं। एेसे क्षेत्र में कार्य करना भी सैनिकों जैसा ही है । - डॉ. कमलेश चौधरी, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, बाड़मेर
Published on:
12 May 2018 07:37 am
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