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डांडियों की खनक, थिरकते कदमों ने जगाई उमंगें

डांडियों की खनक, थिरकते कदमों ने जगाई उमंगें बालोतरा. गूंजते फाल्गुनी गीत, बजते चंग व ढोल, इनके सुर-ताल के साथ डांडिया मिलाते हुए नृत्य करते सैकड़ों युवा। अपलक नजरों से इन्हें निहारते हजारों- हजार लोग। वहीं दूसरी ओर शीतला माता के गूंजते जयकारे।

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बालोतरा. गूंजते फाल्गुनी गीत, बजते चंग व ढोल, इनके सुर-ताल के साथ डांडिया मिलाते हुए नृत्य करते सैकड़ों युवा। अपलक नजरों से इन्हें निहारते हजारों- हजार लोग। वहीं दूसरी ओर शीतला माता के गूंजते जयकारे।

यह नजारा कनाना गांव का था, जहां मंगलवार को विशाल शीतला सप्तमी मेला भरा गया। कोरोना के बाद पहली बार सामान्य स्थिति होने से मेले में उत्साह चरम पर दिखाई दिया। आस-पास गांवों से लोग मेले में पहुंचना शुरू हुए, दोपहर 12 बजे तक यह सिलसिला जारी रहा। इससे मेला मैदान खचाखच भर गया। मंदिर में दर्शन के लिए लंबी कतारें लग गई। बारी आने पर श्रद्धालुओं ने मां का पूजन कर प्रसाद में ठंडा भोजन चढ़ाया। परिवार में खुशहाली की कामना की। महिलाओं ने भजन गाए। इस मौके पर कनाना, सराणा, किटनोद, कुंपावास, पारलू, कम्मों का बाड़ा, सिणली जागीर, देवंदी, धारणा, म्हारों की ढाणी आदि 18 गांवों के गैर दलों ने नृत्य की प्रस्तुति दी। चंग पर बजते फाल्गुनी गीत, ढोल की ढमक के साथ युवाओं ने सफेद, लाल आंगी पहन व पारंपरिक वेशभूषा में नृत्य जमकर किया। मेले में लगे हाट बाजार में खेल-खिलौने, जरूरत के सामान को खरीदने के साथ विभिन्न प्रकार के व्यंजन, चाट पकौड़ी, आईसक्रीम खाने का लुत्फ उठाया। झूलों पर छोटे से लेकर बड़ों में होड़ मची दिखाई दी।

मेले हमारे संस्कृति का प्रतीक

इस मौके पर मेला समारोह में अतिथि राज्य सैनिक कल्याण सलाहकार समिति अध्यक्ष मानवेंद्रसिंह जसोल ने कहा कि मेले हमारी लोक संस्कृति के प्रतीक है। इससे आपसी प्रेम व जीवन में नई ऊर्जा का संचार होता है। मानवेंद्र सिंह ने कहा कि वीर दुर्गादास राठौड़ एक महान योद्धा थे। युवा उनके आदर्शों को जीवन में अपनाएं। पचपदरा विधायक मदन प्रजापत ने कहा कि गेर नृत्य मारवाड़ की मूल संस्कृति है। इससे युवा जुड़ कर आगे बढ़ाएं।