
Jaipur rural patrika : राज्य वृक्ष 'खेजड़ी' का अस्तित्व संकट में
राज्य वृक्ष 'खेजड़ी' का अस्तित्व संकट में
शाहपुरा.
प्रदेश का राज्य वृक्ष 'खेजड़ी' Existence of state tree 'Khejdi' का अस्तित्व संकट में है। पहले प्रति हेक्टेयर 40 से 35 खेजड़ी के वृक्ष होते थे। अब इनकी संख्या 8 से 12 तक रह गई है। अज्ञात रोग और कटाई की वजह से कल्प वृक्ष खेजड़ी संकट में है। अब यह बेहद कम रह गई है।
पानी की कमी एवं रोग के कारण शाहपुरा उपखंड़ क्षेत्र में कई पेड़ सूख गए हैं तो संक्रमण के चलते कई खत्म होने की कगार पर भी है। रोग से बचाने की तरफ वन विभाग का कोई ठोस कदम नजर नहीं आ रहा है।
हालांकि विभागीय आंकड़ों के मुताबिक पिछली साल 4 हजार 500 से अधिक खेजड़ी के पौधे लगाए गए थे। वितरण के लिए भी नर्सरियां में पौध तैयार की जा रही है। लोगों की डिमांड कम है, फिर भी हर साल 4 हजार से अधिक पौधे बेचे जाते है। शाहपुरा रेंज में मनोहरपुर और त्रिवेणी नर्सरी में इस बार भी वितरण के लिए पांच हजार पौध तैयार की है।
किसान भी उजडऩे से नहीं बचा रहे
लोगों का मानना है कि पहले हल से जुताई होती थी तो किसान केवल 6 इंच जमीन खोदता था और खेजड़ी दिखने पर हल को पास से निकाल लेता था, लेकिन ट्रेक्टर ने जमीन को एक से डेढ़ फीट तक खोदकर खेजड़ी को रोंद दिया।
खेजड़ी की जड़ें जमीन में 100 से 150 फीट तक गहराई से पानी खींच लेती हैं, लेकिन भूजल स्तर चार सौ मीटर से अधिक गहराई में जा चुका है। कई इलाकों में भू-जल 800 मीटर तक नीचे पहुंच गया है। इसके अलावा दीपक आदि रोग भी खेजड़ी को नष्ट कर रहे है।
अवैध कटाई भी है कारण
निजी स्वार्थ के चलते भी लोग पेड़ों को काट रहे है। विभागीय आंकड़ों के मुतबिक वर्ष 2018 में 7 केस ऐसे पकड़े थे, जिनमें खेजड़ी की लकडियां थी। वर्ष 2019 में जनवरी से लेकर जुलाई तक अवैध रुप से लकड़ी परिवहन के 25 केस पकड़े है। जिनमें से 6 में खेजड़ी सहित अन्य लकडिय़ां पाई गई है।
हालांकि वन विभाग अवैध कटाई को लेकर सख्त है, लेकिन फिर भी पेड़ों की कटाई जारी है। वर्ष 2017 में 22 केस पकड़े थे। जिनमें से 3 केसों में खेजड़ी लकडियां भी पकडी थी।
फलियां 'सांगरी ' के रुप में प्रसिद्ध
खेजड़ी जून में भी हरी भरी रहकर जानवरों को चारा और इंसानों को छाया देती है। इसका चारा पौष्टिक होता है और एक पेड़ से 60 किलो तक चारा मिलता है। इसकी फलियां 'सांगरी के रुप में प्रसिद्ध है। खेजड़ी का महत्व इस बात से आंका जा सकता है कि जोधपुर के खेजड़ली गांव में खेजड़ी को बचाने के लिए वर्ष 1730 में अमृता देवी सहित 363 लोगों ने प्राण त्याग दिए थे।
इसके नीचे बरसात में बेल वाली सब्जियां जैसे लोकी, तुरई की बुवाई कर वर्ष पर्यन्त उपज ली जा सकती है। विशेषतौर पर विक्रम संवत 1956 वें अकाल में लोगों ने खेजड़ी को भोजन के रुप में उपयोग में लिया था। इसकी पत्तियां भेड़ बकरियों के भोजन का काम करती है। साथ ही इसकी सूखी पत्तियों को खाद के रुप में काम में लिया जाता है।
धार्मिक महत्व व औषधी में भी कम नहीं
खेजड़ी का धार्मिक जीवन में बहुत महत्व है। वेदों में इसे पवित्र शमी वृक्ष कहा जाता है। कई जगह इसकी पूजा भी जाती है। आयुर्वेद में खेजड़ी को कप और कफ और पित को नाश करने में भी उपयोग में लिया जाता है।
यह कसैला होनेके कारण शरीर की रक्त वाहिनियों को संकुचित करता है और इसे रक्त का शोधक माना जाता है। यह शरीर में कमजोरी भी दूर करता है। दस्त, पाइल्स, पेट में कीड़े आदि की समस्याओं को भी दूर करता है।
दस्त से निजात पाने के लिए इसे छाछ के साथ खाने प्रयोग करते है। यह आंतों को भी साफ करती है। छाल का काढा खांसी को दूर करता है तथा फेफड़ों आदि की सूजन को दूर करता है। चर्म रोग के उपचार में भी लाभदायक है।
इनका कहना है--
--नर्सरियों में खेजड़ी की पौध तैयार की जाती है। अधिकतर पानी वाले स्थानों पर वन विभाग की ओर से हर साल खेजड़ी के पौधे लगाए जाते है। वितरण के लिए भी पौध तैयार किए है। भूजल स्तर गहराने से पेड़ सूख रहे है। ----चतुर्भुज शर्मा, रेंजर, वन विभाग कार्यालय शाहपुरा।
----मानसून की अच्छी बारिश हुई है। क्षेत्र के प्रतापपुरा, मामटोरी, राड़ावास, सुराणा में 5 हजार से अधिक खेजड़ी के पौधे लगाए है। जिनकी विशेष रुप से सार-संभाल की जा रही है। उपवन संरक्षक जयपुर उत्तर की ओर से विशेष दिशा निर्देश पर खेजड़ी पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। ----बाबूलाल मीणा, फोरेस्टर, वन विभाग कार्यालय शाहपुरा।
Published on:
08 Aug 2019 09:09 pm

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