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आदिवासी बच्चे घने जंगल पहाड़ी से होकर स्कूल पढऩे जाते हैं

शिक्षा के लिए आदिवासी वनग्रामों के बच्चें सप्ताह में 7-7 दिन स्कूल जरूर पहुंचते हैं, पुनर्वास कैंप चोपना के गोपालपुर गांव से इमलीखेड़ा पांच किलोमीटर की दूरी पर

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आदिवासी बच्चे घने जंगल पहाड़ी से होकर स्कूल पढऩे जाते हैं

सारनी. विकासखंड घोड़ाडोंगरी अंतर्गत ऐसे भी स्कूल है। जहां घने जंगलों की पहाड़ी से होकर बच्चें स्कूल पहुंचते हैं। जंगली जानवरों का डर हर समय बना रहता है। फिर भी शिक्षा के लिए आदिवासी वनग्रामों के बच्चें सप्ताह में 7-7 दिन स्कूल जरूर पहुंचते हैं। कई बार ऐसा भी समय आता है। जब सप्ताह से बच्चें स्कूल नहीं पहुंच पाते। ऐसा ही एक मामला भंडारपानी गांव का है। यह गांव पहाड़ी पर बसा है। पुनर्वास कैंप चोपना के गोपालपुर गांव से इमलीखेड़ा पांच किलोमीटर की दूरी पर है। यहीं प्राथमिक और माध्यमिक शाला है। जबकि स्कूल से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर भंडारपानी गांव है। पहले ऊचीं पहाड़ी है। फिर दूसरी पहाड़ी पर भंडारपानी है। यहां के बच्चें नियमित स्कूल नहीं पहुंचते। लेकिन जब कोई इमलीखेड़ा के स्कूल पहुंचकर भंडारपानी के बच्चों की शिक्षा में रोढ़ा बन रही असुविधा के किस्से सुनेंगे। उनकी आंखें नम हो जाएगी। आश्चर्य की बात यह है कि जिस जंगल में बाघ, तेंदुआ, भालू जैसे खूंखार जानवर है। उस जंगल से होकर भंडारपानी के बच्चें इमलीखेड़ा स्कूल पहुंचते हैं। गुरुवार को जब पत्रिका टीम इमलीखेड़ा पहुंची तो एक भंडारपानी के एक भी बच्चें स्कूल में नहीं मिले। दरअसल बीते कुछ दिनों से इस जंगल में बाघ की मूवमेंट है।

महिने में सात या आठ दिन ही जाते हैं
विकासखंड घोड़ाडोंगरी अंतर्गत ऐसे भी स्कूल है जहां घने जंगलों की पहाड़ी से होकर बच्चें स्कूल पहुंचते हैं। जंगली जानवरों का डर हर समय बना रहता है। फिर भी शिक्षा के लिए आदिवासी वनग्रामों के बच्चें महिने में सात या आठ दिन ही स्कूल पढऩे जरूर पहुंचते हैं। बच्चों ने बताया कि स्कूल जाते समय घने जंगल से होकर जाना पड़ता है। उन्होंने बताया कि गांव में स्कूल नहीं होने के कारण पढ़ाई करने के लिए दूसरे गांव पढऩे के लिए आत हैे।

सूख गया हैंडपंप
घोड़ाडोंगरी विकासखंड का भंडारपानी आखिरी गांव है। इसके बाद होशंगाबाद जिला प्रारंभ हो जाता है। भंडारपानी के बच्चें शिक्षा ग्रहण करने इमलीखेड़ा पहुंचते हैं। यहां के प्राथमिक शाला परिसर में हैंडपंप है। जिसमें पानी भी पर्याप्त है। लेकिन कुछ दूरी पर माध्यमिक शाला है। जहां शाला परिसर में लगा हैंडपंप फरवरी माह में ही सूख गया है। स्कूली बच्चें घर से ही बॉटल में पानी लेकर पहुंचते हैं। खासबात यह है कि यह स्कूल अतिथि शिक्षकों के भरोसे हैं। यहां समस्या तो कई है। लेकिन कोई भी कुछ भी कहने से डरते हैं।