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छह माह का वेतन अटका, जवाबदेही से बचता स्वास्थ्य तंत्र

-बंधपत्र चिकित्सकों की शिकायत पर बैतूल पहुंचीं क्षेत्रीय संचालक, सीएमएचओ की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल। बैतूल। जिले में पदस्थ बंधपत्र चिकित्सकों को पिछले छह माह से वेतन नहीं मिलने का मामला अब स्वास्थ्य विभाग के लिए गंभीर संकट बनता जा रहा है। लगातार शिकायतों के बाद भी समाधान नहीं होने पर चिकित्सकों ने कलेक्टर […]

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-बंधपत्र चिकित्सकों की शिकायत पर बैतूल पहुंचीं क्षेत्रीय संचालक, सीएमएचओ की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल।

बैतूल। जिले में पदस्थ बंधपत्र चिकित्सकों को पिछले छह माह से वेतन नहीं मिलने का मामला अब स्वास्थ्य विभाग के लिए गंभीर संकट बनता जा रहा है। लगातार शिकायतों के बाद भी समाधान नहीं होने पर चिकित्सकों ने कलेक्टर से लेकर प्रमुख सचिव तक गुहार लगाई। इसके बाद गुरुवार को स्वास्थ्य विभाग की क्षेत्रीय संचालक डॉ. नीरा चौधरी जांच के लिए बैतूल पहुंचीं। सुबह 11 बजे से उन्होंने समस्त बंधपत्र चिकित्सकों की बैठक लेकर एक-एक कर उनकी समस्याएं सुनीं और सवाल-जवाब किए।
बैठक के दौरान चिकित्सकों ने न सिर्फ वेतन भुगतान में हो रही देरी बल्कि भुगतान के एवज में पैसों की मांग किए जाने जैसी गंभीर शिकायतें भी सामने रखीं। क्षेत्रीय संचालक ने इन आरोपों की बारीकी से जांच करते हुए संबंधित बिंदुओं पर पूछताछ की। वहीं इस पूरे मामले में सीएमएचओ मनोज हुरमाड़े अपनी भूमिका का बचाव करते नजर आए। उन्होंने बैठक में चिकित्सकों से कहा कि यदि अकाउंट सेक्शन में गड़बड़ी हो रही थी या किसी द्वारा पैसों की मांग की जा रही थी तो उन्हें सीधे सूचना दी जानी चाहिए थी। यहां तक कि उन्होंने यह भी कहा कि कलेक्टर और प्रमुख सचिव तक शिकायत करना उचित नहीं था। हालांकि यहीं से पूरे मामले पर सवाल और गहरे हो जाते हैं। जब छह माह से चिकित्सकों को वेतन नहीं मिला तो क्या सीएमएचओ इससे अनजान थे? यदि वे जानकार थे तो भुगतान के लिए समय रहते ठोस प्रयास क्यों नहीं किए गए? और यदि चिकित्सकों ने सीएमएचओ या उनके कार्यालय से संपर्क किया था, तब भी भुगतान क्यों नहीं हुआ? इन सवालों के स्पष्ट जवाब बैठक में नहीं मिल सके। हकीकत यह है कि जब स्थानीय स्तर पर समस्या का समाधान नहीं हुआ, तब मजबूरी में चिकित्सकों को उच्च स्तर तक शिकायत करनी पड़ी, लेकिन इसके बावजूद सीएमएचओ और उनका अमला अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ता नजर आया। यह रवैया न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करता है। इधर क्षेत्रीय संचालक डॉ. नीरा चौधरी ने चिकित्सकों की अस्पतालों में उपस्थिति और समयपालन को लेकर भी चर्चा की, लेकिन मूल प्रश्न यही बना रहा कि जिन चिकित्सकों के कंधों पर ग्रामीण और शहरी स्वास्थ्य सेवाओं की जिम्मेदारी है, उन्हें समय पर वेतन तक क्यों नहीं दिया जा सका। अब देखना होगा कि जांच के बाद जिम्मेदारों पर क्या कार्रवाई होती है या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।