
तालबंदी के अप्रतिम गायक डॉ. बाबूलाल पलवार
भरतपुर . कस्बा नगर में वर्ष 1928 में जन्मे तालबंदी के अप्रतिम गायक डॉ. बाबूलाल पलवार ने जीवनभर दर्जीगिरी कर जहां चुनौतीपूर्ण जीवनयापन किया। वहीं मुगल आक्रांताओं की चुनौती से उत्पन्न व ताल ठोककर जन्मी राजस्थान सहित ब्रजमंडल की इस अनूठी गायन शैली को भी बाल्यावस्था में ही आत्मसात कर लिया। जीवन के अंतिम क्षणों तक उन्होंने नांद के सम और तोड़ पर टिकी तथा समूह में खड़े होकर गाई जाने वाली तालबंदी का न केवल गायन किया, बल्कि उसके शिक्षण-प्रशिक्षण, प्रचार-प्रसार और संरक्षण-संवर्धन की दिशा में भी महनीय योगदान दिया।
मेरा उनसे प्रथम परिचय अस्सी के दशक में हुआ, जब मैं ब्रज कला केन्द्र का राष्ट्रीय सचिव और ब्रज संगीत विद्यापीठ का सचिव था, लेकिन संबंधों में प्रगाढ़ता तब आई जब मैंने उनको तीन दिवसीय राष्ट्रीय लोक कला महोत्सव में मथुरा आमंत्रित किया। उनका प्रदर्शन मुझ सहित देशभर से जुटे तमाम कलाकारों, विद्वानों और प्रशासनिक अधिकारियों तक के मन को छू गया। इसके कुछ ही समय बाद ब्रज संगीत विद्यापीठ मथुरा के दीक्षांत समारोह में सचिव की हैसियत से मैंने और आगरा विवि के तत्कालीन कुलपति मंजूर अहमद ने मानद डॉक्टरेट की उपाधि उनको प्रदान की। यही नहीं, भरतपुर की शोधार्थिनी स्नेहलता शर्मा ने मेरी प्रेरणा से बाबूलाल के व्यक्तित्व-कृतित्व पर राजस्थान विवि से पीएचडी की उपाधि भी प्राप्त की, जिसका लोकार्पण भी मैंने नगर के श्रीराम रथयात्रा के तालबंदी समारोह में किया।
यह उनकी गायकी का ही कमाल था कि सिख सन्त गुरु मसकीन साहिब को अलवर गुरुद्वारा में उनको सम्मानित करने को विवश होना पड़ा। डॉ. पलवार अपने शिष्य सरदार बीरबल सिंह के साथ इस समागम में गए थे। सिफारिश पर उनको भी अगले दिन गाने के लिए दो मिनट का समय मिल गया। जैसे ही डॉ. पलवार ने राग बिहाग में गुरुवाणी 'मेरे मन नाम नित-नित लेÓ गाते हुए विलंबित तानें शुरू कीं तो गुरुद्वारा साहिब चण्डीगढ़ का प्रख्यात तबला वादक तुरन्त मंच पर आकर संगत करने लगा। दो की जगह 12 मिनट गायन चला। स्वयं सन्त मसकीन साहिब ने 3 रागी दुपट्टा पहनाकर उनका अभिनंदन किया।
'कन्हैया ने पनघट पे घेर लई री, ऐसी मेरी चुनर रंग में रंगी, पकर झकझोरी श्याम मोरी बैयांÓ जैसी उनकी ठुमरियां आज भी रसिक दिलों में बसी हैं। वह अनेक अप्रचलित राग और लय के 29 दर्जों के जानकार थे। शहाना, कौशिकध्वनि, गोरख कल्याण, केदार, रामकली व छायानट आदि राग उनको अत्यंत प्रिय थे। अनेक सन्त वाणियों, हवेली संगीत और स्वामी हरिदास विरचित 'केलिमालÓ के पदों का तालबंदी दंगलों में गायन करने वाले भी वह एकमात्र गायक थे। उन्होंने रामलीला कला मण्डल नगर में जीवनभर संगीत निदेशक की भूमिका निभाई। जीवन के अन्तिम समय में पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र उदयपुर की ओर से गुरु-शिष्य परम्परागत तालबन्दी गायन प्रशिक्षण प्रदान कर छोटे-छोटे बालक-बालिकाओं को इस विधा से जोड़ा और शिल्प ग्राम उदयपुर में उनका प्रदर्शन कराया। यहीं उनके जीवन का अन्तिम साक्षात्कार डॉ. मालिनी काले बांसवाड़ा और सूचना जनसंपर्क निदेशक नटवर लाल त्रिपाठी चित्तौडगढ़़ ने लिया।
शिष्य करते हैं तालबंदी गायन
पांच जुलाई 2008 को उनके निधनोपरांत स्थानीय नगर पालिका मण्डल नगर (भरतपुर) में प्रतिवर्ष श्रीराम रथ यात्रा मेला के समय सम्पूर्ण रात्रि तालबंदी समारोह का आयोजन चैत्र शुक्ल दशमी को करता है, जिसमें अनेक जिलों से उनके शिष्यगण तालबंदी गायन करते हैं। मैं सौभाग्यशाली हूं कि प्रतिवर्ष मुख्य अतिथि या अध्यक्ष की हैसियत से मुझे भी इस दिव्य गायकी के रसास्वादन के साथ नांद का गांभीर्य भी सुनने को मिलता है। ऐसे कला मनीषी डॉ. बाबूलाल को मेरा कोटि-कोटि नमन।
डॉ. राजेन्द्र कृष्ण अग्रवाल
संगीताचार्य/लेखक/कवि
संपादक संगीत मासिक हाथरस
डॉ. राजेन्द्र कृष्ण संगीत महाविद्यालय
संगीत-सदन मथुरा उत्तरप्रदेश
Published on:
09 Apr 2022 08:02 am
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