29 जनवरी 2026,

गुरुवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

कोरोना ने बनाया आत्मनिर्भर: वाटर प्रूफ पैनल डोर बनाने का काम सीखकर कमाया नाम

-नदबई के गांव रौनीजा निवासी वीरेंद्र सिंह की कहानी

2 min read
Google source verification
कोरोना ने बनाया आत्मनिर्भर: वाटर प्रूफ पैनल डोर बनाने का काम सीखकर कमाया नाम

कोरोना ने बनाया आत्मनिर्भर: वाटर प्रूफ पैनल डोर बनाने का काम सीखकर कमाया नाम

नदबई. कोरोना काल के चलते लॉकडाउन ने भले ही बड़ी संख्या में लोगों को बेरोजगार किया है, लेकिन कुछ ऐसे भी शख्स हैं, जिनको कोरोना ने आत्मनिर्भर बनने पर मजबूर कर दिया। अब वो पहले से भी अधिक मेहनत कर मुनाफा उठा रहे हैं। गांव रौनीजा निवासी वीरेंद्र सिंह ने मेहनत और लगन से एक उदाहरण पेश किया है। वीरेंद्र सिंह अपने जीजा शीशवाड़ा निवासी सुखबीर सिंह के साथ 11 वर्षों से नोएडा में रहकर गांव रौनीजा में रहने वाले परिवार का पालन पोषण कर रहा था। वीरेंद्र के परिवार में सात सदस्य हैं। तीन बेटियों के बाद सबसे छोटा पुत्र है, साथ में बूढ़े माता- पिता हैं। वीरेन्द्र के अलावा परिवार का पालन पोषण करने वाला कोई नहीं है। फिर भी किसी तरह नोएडा में रहते हुए मोबाइल रिपेयरिंग की दुकान चलाकर, किराया और खर्चा काटकर बमुश्किल पांच हजार रुपए घर भेज पाता था, लेकिन लॉकडाउन ने उसका यह काम भी उससे छीन लिया। पैतृक गांव वापस आकर कुछ दिन तो परेशान रहा, उसने कुछ नया करने की ठान कर अपने किसी परिचित से 40 हजार रुपए कर्जा लेकर अपने घर पर ही वाटर प्रूफ पैनल डोर बनाने का कार्य शुरू कर दिया। अप्रैल माह में शुरू किया हुआ यह नया कार्य अजीब जरूर लगा, लेकिन जीजा के सहयोग से दोनों ने मिलकर दिन रात मेहनत करते हुए काम को धीरे-धीरे बढ़ाया। आज स्थिति यह है कि विगत पांच माह की मेहनत का फल उनको अब मिलने लगा है। आसपास के क्षेत्र कठूमर, नदबई, जनूथर, नगर में उनकी ओर से बनाए जा रहे वाटर प्रूफ पैनल डोर की डिमांड बढ़ गई है।

इधर, आठवीं पास रजनी ने सुधारी परिवार की आर्थिक स्थिति

डीग. आठवीं पास रजनी डीग तहसील के गांव खोह में रहती है, इनके पति मजदूरी का कार्य करते है। रजनी के चार छोटे-छोटे बच्चे है। परिवार की आर्थिक स्थिति भी बहुत कमजोर है। रजनी जाति से कुम्हार है, परिवार के अन्य सदस्य कुम्हारी कार्य कर अपनी आजीविका यापन करते है। रजनी का परिवार अपनी आजीविका को चलने के लिए कुम्हारी का कार्य या मजदूरी करते थे। रजनी सिलाई का कार्य करना जानती थी, अपनी आजीविका सिलाई का कार्य करके गुजारा करती थी, लेकिन अपने परिवार का पूर्ण रूप से पालन पोषण नही कर पा रही थी। रजनी को सिलाई का ज्ञान था लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति में कोई भी बदलाव नही आया, तब रजनी को लुपिन संस्था की ओर से गांव की महिलाओं को सिलाई सीखने के लिए प्रेरित किया। रजनी ने अपने गांव में 40 महिलाओं को सिलाई का प्रशिक्षण सिखाया और उन महिलाओं को सिलाई के कार्य से जोड़ा। वर्तमान में रजनी ने अपने ही घर मे सिलाई का कार्य करने का सेंटर खोल लिया है उसमें 10 से 15 महिलाये सिलाई का कार्य कर रही है। रजनी अब 10 से 12 हजार रुपए प्रतिमाह कमा रही है।

Story Loader