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VIDEO#अल्पायु में ली दीक्षा, अब फैला रहे शिव महिमा का प्रकाश

-रंजीत नगर में हो रही शिवमहापुराण कथा

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VIDEO#अल्पायु में ली दीक्षा, अब फैला रहे शिव महिमा का प्रकाश

VIDEO#अल्पायु में ली दीक्षा, अब फैला रहे शिव महिमा का प्रकाश

भरतपुर. रणजीत नगर स्थित काली मंदिर के पास विद्या मैरिज होम में शिवमहापुराण कथा का आयोजन किया जा रहा है। वृंदावन के आचार्य सतानन्द महाराज कथा के जरिए भगवान शिव की महिमा का गुणगान कर रहे हैं। इसके तहत प्रतिदिन 11 हजार पार्थिव शिवलिंग निर्माण एवं शिव रुद्राभिषेक त्रिमुखी रुद्राक्षर्चन प्रयाग से लाए गए। गंगाजल से काशी के विद्वान ब्राह्मणों की ओर से किया जा रहा है। इसके बाद दोपहर तीन बजे से शाम छह बजे तक कथा का वाचन किया जाता है। कथा के चौथे दिन रुद्राक्ष महिमा, शिव-पार्वती विवाह, तारकासुर वध, शिव पूजन की विधि और पार्थिव बनाने व उनके पूजन की विधि के बारे में बताया।

ऐसे मिली कथा वाचन की प्रेरणा

राजस्थान पत्रिका से बातचीत के दौरान आचार्य सतानन्द महाराज ने बताया कि उनका जन्म प्रयाग के चरवाखुर्द (चरकमुनी धाम) गांव में 30 जून 1996 को हुआ था। उनकी कक्षा आठवीं तक की शिक्षा गांव में ही हुई। जब वे कक्षा चार में थे तब उनके गांव में बरसाना से एक कथावाचक कथा करने आए थे, उन्हें देखकर उनके मन में कथावाचक बनने की इच्छा प्रबल हुई। विद्यालय के प्रधानाचार्य ने उनके माता पिता से उन्हें संस्कृत पढ़ाने के लिए कहा। माता-पिता के मना करने पर उनके बड़े भाई सिद्ध विनायक मिश्रा ने उन्हें संस्कृत पढऩे के लिए प्रेरित किया और गांव से आठवीं कक्षा की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे संस्कृत पढऩे के लिए वृंदावन आ पहुंचे और वहां गोपेश्वर महादेव के पास बंशीवट पर आश्रम पर रहने लगे।

15 वर्ष की अल्पायु में ली दीक्षा

प्रयाग में ही वर्ष 2012 में लगे महाकुंभ में जगदगुरु आचार्य मलूकपीठाधीश्वर स्वामी राजेंद्र दास देवाचार्य महाराज से दीक्षा ग्रहण की और तभी से अपने आप को शिव की सेवा में समर्पित कर दिया। सतानन्द महाराज ने बताया कि अपने गुरु के कृपापात्र होने के चलते उन्हें शिवमहापुराण कथा में महारथ प्राप्त हुई।

काशी विश्वविद्यालय से ली आचार्य की शिक्षा

सतानन्द महाराज ने अपने संस्कृत की शिक्षा काशी के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से पूरी की। वर्तमान में वे यहीं से संस्कृत व्याकरण में पीएचडी कर रहे हैं। उन्होंने विश्वविद्यालय का एक रोचक किस्सा बताते हुए कहा कि एक दिन वे क्रिकेट खेल रहे थे, उसी समय वहां के आचार्य ने उन्हें बुलाया और स्लोक सुनाने को कहा। स्लोक पूरा सही सुनाने पर उन्हें वाल्मीकि जयंती पर आयोजित होने वाली संस्कृत गीत अंतराक्षरी के लिए चयन किया गया। इसके प्रथम राउण्ड में उन्होंने जिला टॉप किया और दूसरे राउण्ड में मंडल में सांत्वना पुरस्कार प्राप्त किया। इसके बाद मंडल की ओर से प्रदेश स्तर पर आयोजित हुई प्रतियोगिता में दूसरा स्थान मिला। उनके वापस आने पर माता पिता काफी खुश हुए।

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