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माधुरी से मां की धुरी बन कहलाईं यशोदा

सैकड़ों बच्चों की यशोदा बनकर कान्हा सा लाड लड़ा रहीं माधुरी- सैकड़ों बच्चों की यशोदा मां हैं डॉ. माधुरी भारद्वाज

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माधुरी से मां की धुरी बन कहलाईं यशोदा

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भरतपुर . मां के रूप में उन्होंने भले ही कोख से कोई कान्हा नहीं जन्मा है, लेकिन उनका दुलार यशोदा से कतई कमतर नहीं है। जननी मां तो सीमित संतानों पर ही अपना लाड लुटाती है, लेकिन यशोदा मां के रूप में वह ममता की छांव देने में वट वृक्ष सरीखी हो गई हैं। हम बात कर रहे हैं मां माधुरी बृज वारिस सेवा सदन की संचालक डॉ. माधुरी भारद्वाज का। आज डॉ. माधुरी सैकड़ों लावारिस और दीन-हीनों बच्चों की यशोदा मां बनकर उन पर कान्हा सरीखा प्यार लुटा रही हैं।
डॉ. माधुरी यशोदा मां की महिमा को और विराट करती नजर आ रही हैं। डॉ. माधुरी मानती हैं कि मुझे यह नेमत 'ठाकुरजीÓ ने बख्शी है। दुनिया में आने वाले हर बच्चे के खाने-दाने का इंतजाम ईश्वर करते हैं। यह मेरी खुशनसीबी है कि कुछ बच्चों के पालन-पोषण का मौका उन्होंने मुझे दिया है। मदर टेरेसा से जीवन से प्रेरणा लेने वाली डॉ. माधुरी के मन में शुरू से ही दीन-हीनों की सेवा का जज्बा था। इस सेवा को वह ईश्वर की सेवा मानती हैं। यही वजह है कि उन्होंने अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए जिंदगी जीने की ठानी है। इस पथ पर वह निरंतर अग्रसर हैं। आज अपना घर में रह रहे सैकड़ों बच्चे उनके दुलार से प्रफुल्लित हैं। सेवा के भाव की बदौलत आज अपना घर देशभर में सेवा का दूसरा नाम बन गया है। अपना घर में रह रहे ऐसे बच्चों को बेहतर शिक्षा के साथ संस्कार दिए जा रहे हैं, जिससे वह समाज की मुख्यधारा में शामिल हो सकें। इस काम में डॉ. माधुरी के पति डॉ. बी.एम. भारद्वाज भी जुटे हैं।

एक प्रतिज्ञा ने बना दिया यशोदा

विवाह बंधन में बंधने से पहले ही उन्होंने और उनके पति अपना घर के संस्थापक डॉ. बी.एम. भारद्वाज ने संतान नहीं करने का प्रण लिया। हालांकि यह फैसला कतई आसान नहीं था, लेकिन वह इस पर अटल रहे। यही वजह है कि मां माधुरी की पहचान आज यशोदा सरीखी है। इस कठिन डगर पर चलते हुए उनका सामना ढेरों समस्याओं से हुआ, लेकिन हौसलों के दम पर उन्होंने इससे पार पा लिया। अपनी संतान नहीं करने का फैसला भी इसी वजह से लिया गया कि वह दूसरे बच्चों पर अपना दुलार लुटा सकें। इसी के चलते संस्थान का नाम भी 'मां माधुरी ब्रज वारिस सेवा सदन रखा गया। आज वह इस सेवा के संकल्प को सोलह आना सच साबित करती नजर आ रही हैं।

अनाथों का सहारा बनना फख्र की बात

सुध-बुध खो चुकी सड़कों पर घूमती महिलाएं कई बार हवस का शिकार बनी। वह गर्भवती होकर अपना घर पहुंचीं तो उन्हें इसका कतई इल्म भी नहीं था। खुद की काया को नहीं संभालने वाली ऐसी महिलाओं के लिए बच्चे को संभालना बेहद कठिन था। ऐसे में डॉ. माधुरी ऐसे बच्चों का सहारा बनी हैं। कई बच्चे ऐसी महिलाओं के साथ भी अपना घर पहुंचे हैं। इन सभी बच्चों की वह यशोदा बनी हुई हैं। इसके अलावा भीख मांगते बच्चों की पीड़ा भी उनसे देखी नहीं गई और उन्हें अपना घर में दाखिल किया। आज वह ऐसे सैकड़ों बच्चों की मां बनी हुई हैं। डॉ. माधुरी कहती हैं कि दीन-हीन बच्चों को अच्छी शिक्षा, अच्छा स्वास्थ्य एवं बेहतर ज्ञान देने का प्रयास किया जा रहा है, जिससे वह समाज की मुख्य धारा से जुड़ सकें। अपना घर आश्रम में रहने वाले ऐसे सभी बच्चों को शिक्षा, स्वास्थ्य और संस्कार दिए जा रहे हैं, जिससे वह भविष्य में खुद को किसी से कमतर नहीं समझें और समाज के लिए नया उदाहरण पेश करें।

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