पितृ पक्ष: ऐसे करें पितरों का तपर्ण, तृप्त होकर देंगे आशीर्वाद, नाराज हुए तो टूट पड़ता है मुसीबतों का पहाड़

Pitru Paksha: श्राद्ध से जुड़ी कई ऐसी बाते हैं, जो बहुत कम लोग जानते हैं मगर ये बातें श्राद्ध करने से पूर्व जान लेना बहुत जरूरी है। क्योंकि कई बार विधिपूर्वक श्राद्ध न करने से पितृ श्राप भी दे देते हैं।

By: Dakshi Sahu

Published: 26 Sep 2021, 01:19 PM IST

भिलाई. इन दिनों श्राद्ध महापर्व यानी पितृ पक्ष चल रहा है। लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शंाति के लिए उन्हें तर्पण करते हैं। कहा जाता है कि पितृपक्ष में पितर कुश की नोक पर निवास करते हैं। इसी कारण तर्पण करते समय कुश को उंगलियों में धारण किया जाता है। जो भी तर्पण किया जाता है वह इसी कुश के द्वारा पितरों को प्राप्त होता है। पितृ पक्ष को लेकर यह मान्यता है कि पूर्वजों को कष्टों से निजात दिलाने श्राद्ध किया जाता है।

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तृप्त होकर पितर देते हैं आशीर्वाद
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जब सूर्य नारायण कन्या राशि में विचरण करते हैं, तब पितृलोक पृथ्वी लोक के सबसे अधिक नजदीक आता है। श्राद्ध का अर्थ पूर्वजों के प्रति श्रद्धा भाव से है, जो मनुष्य उनके प्रति उनकी तिथि पर अपनी साम्र्थय के अनुसार फलफूल अन्न मिष्ठान आदि से ब्राह्मण को भोजन कराते हैं, उस पर प्रसन्न होकर पितृ उसे आशीर्वाद देकर जाते हैं।

पितरों की संतुष्टि के लिए किया जाता है श्राद्ध
पितरों के लिए किए जाने वाले श्राद्ध दो तिथियों पर किए जाते है। प्रथम मृत्यु या क्षय तिथि पर और द्वितीय पितृ पक्ष में जिस मास और तिथि को पितर की मृत्यु हुई है। जिस तिथि को उसका दाह संस्कार हुआ है। वर्ष में उस तिथि को एकोदिष्ट श्राद्ध में केवल एक पितर की संतुष्टि के लिए श्राद्ध किया जाता है। इसमें एक पिंड का दान और एक ब्राह्मण को भोजन कराया जाता है पितृपक्ष में जिस तिथि को पितर की मृत्यु तिथि आती है, उस दिन पार्वण श्राद्ध किया जाता है। पार्वण श्राद्ध में 9 ब्राह्मणों को भोजन कराने का विधान है, किंतु शास्त्र किसी एक सात्विक एवं संध्यावंदन करने वाले ब्राह्मण को भोजन कराने की भी आज्ञा देते हैं।

विधिपूर्वक करना चाहिए श्राद्ध
श्राद्ध से जुड़ी कई ऐसी बाते हैं, जो बहुत कम लोग जानते हैं मगर ये बातें श्राद्ध करने से पूर्व जान लेना बहुत जरूरी है। क्योंकि कई बार विधिपूर्वक श्राद्ध न करने से पितृ श्राप भी दे देते हैं। पितरों की संतुष्टि के उद्देश्य से श्रद्धापूर्वक किए जाने वाले तर्पण ब्राह्मण भोजन दान आदि कर्मों को श्राद्ध कहा जाता है। इसे पितृयज्ञ भी कहते हंै। श्राद्ध के द्वारा व्यक्ति पितृऋण से मुक्त होता है और पितरों को संतुष्ट करके स्वयं की मुक्ति के मार्ग पर बढ़ता है। श्राद्ध या पिण्डदान दोनों एक ही शब्द के दो पहलू है पिण्डदान शब्द का अर्थ है अन्न को पिण्डाकार में बनाकार पितर को श्रद्धा पूर्वक अर्पण करना। इसी को पिण्डदान कहते है। दक्षिण भारतीय पिण्डदान को श्राद्ध कहते हैं।

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