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भीलवाड़ा: लापरवाही की खान; अरावली क्षेत्र में नई लीज पर रोक, फिर भी नहीं चेत रहे पट्टाधारक

खनिज विभाग का बड़ा एक्शन: 10 से अधिक खनन पट्टे निरस्त करने के प्रस्ताव उदयपुर भेजे

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A Hotbed of Negligence: Ban on New Leases in the Aravalli Region—Yet Leaseholders Remain Unrepentant

लापरवाही की खान; अरावली क्षेत्र में नई लीज पर रोक, फिर भी नहीं चेत रहे पट्टाधारक

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद अरावली क्षेत्र में आने वाले भीलवाड़ा जिले में नए खनन पट्टों (लीज) पर पूरी तरह से रोक लगी हुई है। ऐसे में वर्तमान में संचालित खदानें किसी 'सोने की खान' से कम नहीं हैं। लेकिन विडंबना देखिए कि जिन खदान मालिकों के पास ये बहुमूल्य पट्टे मौजूद हैं, वे महज 8 से 10 लाख रुपए के मामूली बकाए और घोर लापरवाही के चलते इन्हें गंवाने की कगार पर हैं।

खनिज विभाग भीलवाड़ा ने ऐसे 10 से अधिक खनन पट्टा धारकों के खिलाफ सख्त कदम उठाते हुए उनके पट्टे निरस्त करने के प्रस्ताव अतिरिक्त खान निदेशक (एडीएम), उदयपुर को भेज दिए हैं। इन सभी खदानों पर पिछले दो साल या उससे अधिक समय से खनन कार्य पूरी तरह बंद है।

मामला पहुंचा उदयपुर, एक्शन मोड में विभाग

खनिज विभाग अब पूरी तरह एक्शन मोड में है। खनि अभियन्ता भीलवाड़ा की ओर से भेजे गए प्रस्ताव के अनुसार, आसीन्द तहसील के ग्राम दौलतगढ़ के निकट 'चॉइसग्रेनाइट' के पक्ष में 3 हेक्टेयर क्षेत्र स्वीकृत था। विभागीय ऑनलाइन पोर्टल और वार्षिक रिटर्न की जांच में सामने आया कि इस खदान में पिछले दो वर्षों से अधिक समय से न तो कोई उत्पादन हुआ है और न ही खनिज का निर्गमन किया गया है।

नियमों का उल्लंघन: 2 साल बंद तो लीज 'लैप्स'

खनि अभियन्ता महेश शर्मा ने बताया कि लगातार दो साल तक उत्पादन बंद रखना राजस्थान अप्रधान खनिज रियायत नियमावली-2017 के नियम 26(ए)(आई) का स्पष्ट उल्लंघन है। इस नियम के तहत यदि खदान में दो वर्ष तक काम बंद रहता है, तो खनन पट्टा 'लैप्स' की श्रेणी में आ जाता है। इसी आधार पर चॉइस ग्रेनाइट सहित 10 से ज्यादा पट्टेदारों के खिलाफ निरस्तीकरण की सिफारिश की गई है। इन पर पिछले कुछ सालों का 8 से 10 लाख रुपए का राजस्व भी बकाया है।

जानकारों की राय: बाद में भुगतना पड़ेगा भारी खामियाजा

विशेषज्ञों का कहना है कि अरावली क्षेत्र होने के कारण नई लीज मिलना अब लगभग असंभव है। ऐसे में पुरानी लीज को बचाकर रखना ही समझदारी है। अधिकारियों का कहना है कि पट्टेदार बकाया राशि जमा करवाकर अब भी पट्टा बचा सकते हैं, लेकिन हैरानी है कि उनकी ओर से कोई प्रयास नहीं किए जा रहे। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में ये खदान मालिक अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मारेंगे।