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Bhilwara news : परंपरा हो रही लुप्त, अब कम नजर आते है होली के बड़कुले

आधुनिकता की चकाचौंध में दम तोड़ रही परंपराएं अब बुजुर्ग महिलाएं व बालिकाएं ही बनाती हैं बड़कुले

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The tradition is disappearing, now the Holi Badkule are rarely seen

The tradition is disappearing, now the Holi Badkule are rarely seen

Bhilwara news : आधुनिकता में रंगों के पर्व की कई परंपराएं भी समय के साथ दम तोड़ती नजर आ रही है। ऐसी ही एक परंपरा है गोबर के बड़कुले की। एक समय था जब होली के कई दिनों पहले ही महिलाएं व बालिकाएं गोबर से बड़कुले बनाने में जुट जाती थी ताकि उनकी होली के दिन पूजा कर होलिका दहन के लिए उपयोग किया जा सके। लेकिन अब बुजुर्गों की सीख से कुछेक बालिकाएं ही बड़कुले बनाती है। बुजुर्गों की माने तो शहर सहित गांवों में महिलाएं व युवतियां होली के दस दिन पूर्व ही गाय के गोबर से तरह-तरह के डिजाइन के बड़कुले तैयार करने लग जाती थी। बड़कुलों को अलग-अलग डिजायन में बनाया जाता था। लेकिन अब यह परंपरा आधुनिकता की भेंट चढ़ गई है।

बड़कुले का विशेष महत्व

बडक़ुले बनाने में सिर्फ गाय के गोबर का ही उपयोग होता है। बड़कुले को होलिका दहन से पहले पूजा जाता है। होलिका दहन के समय इनकी माला को भाइयों के सिर के ऊपर से सात बार घुमाकर होली में डाला जाता है। ऐसी मान्यता है कि इससे सारी विपदाएं दूर हो जाती हैं। गोबर से बने बड़कुले को आकर्षक बनाने के लिए रस्सी से माला बनाई जाती है और फिर इन्हें होलिका दहन के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

बढ़ता है सकारात्मक वातावरण

गोबर के ढाल-तलवार बनाए जाते हैं। पूर्णिमा के दिन माला बनाकर पूजा के बाद दहन होता है। पंडित अशोक व्यास के अनुसार गाय का गोबर शुभता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। जब इसे जलाया जाता है तो निकलने वाला धुआं घर से नकारात्मक शक्तियों को दूर करता है। यही कारण है कि यज्ञ और हवन में भी गाय के गोबर का उपयोग किया जाता है।

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