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संकट के सेंटर बने सरकारी खरीद केन्द्र, मुश्किल में हमारा अन्नदाता

खेतों में दिन-रात मेहनत के बाद फसलें घर आई तो किसानों के चेहरे पर उम्मीद की चमक थी

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खेतों में दिन-रात मेहनत के बाद फसलें घर आई तो किसानों के चेहरे पर उम्मीद की चमक थी, लेकिन सरकारी नीतियों से यह फीकी हो गई।

भीलवाड़ा।

खेतों में दिन-रात मेहनत के बाद फसलें घर आई तो किसानों के चेहरे पर उम्मीद की चमक थी, लेकिन सरकारी नीतियों से यह फीकी हो गई। मेहनत का पैसा कहां और कब मिलेगा, इसे लेकर हमारा अन्नदाता संशय में हैं। कारण है कि खुद सरकार किसानों से फसल खरीद कर धोखा कर रही है। कारण है कि फसलों का दाम समय पर नहीं चुका रही है।

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सरकार ही यह कर रही है तो मजबूरन किसानों को ओने-पौने दामों में ही अपनी फसल व्यापारियों को बेचनी पड़ रही है। इस खेल में अन्नदाता उलझ गए हैं। राजस्थान पत्रिका ने अन्नदाता की पीड़ा पर पड़ताल की तो चौंकाऊ हकीकत सामने आई है। इसमें पता चला है कि सरकार ने जिले के किसानों से अक्टूबर-नवंबर 2017 में ही उड़द और मूंग खरीद लिए। इसके लिए समर्थन मूल्य खरीद के काउंटर बनाए। किसानों ने सरकारी एजेंसी पर भरोसा किया। हकीकत यह है कि किसानों को अब तक उसका पैसा नहीं मिला। किसानों की परेशानी पर विस्तृत रिपोर्ट-

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उड़द-मूंग में कैसे हुआ किसानों के साथ धोखा
प्रदेश में तीन माह पहले समर्थन मूल्य पर हुई मूंग खरीद का भुगतान अभी हजारों किसानों को नहीं मिला है। भुगतान के लिए किसानों को बैंकों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। प्रदेश के 47,583 किसान हैं, जिन्हें 471 करोड़ रुपए का भुगतान होना है। अक्टूबर से जनवरी तक चली खरीद में मूंग के साथ ही उड़द, सोयाबीन व मूंगफली की खरीद हुई थी। राजफैड ने 169 स्थानों पर कांटे लगाए थे।

सरकार ने पहली बार भुगतान की नई व्यवस्था की है। खरीद के बाद भुगतान सीधे किसान के खाते में देने का वादा किया था। हालांकि वादा अभी पूरा नहीं हुआ। हजारों किसानों के खाते में अभी उनकी फसल का भुगतान नहीं पहुंचा है। किसान लगातार खरीद केन्द्र के साथ राजफैड के कार्यालयों के चक्कर लगा रहे हैं, क्योंकि खरीद राजफैड करता है। भीलवाड़ा जिले में 758 किसानों का पैसा बकाया है। जिले में 06 करोड़ 06 लाख 63 हजार रुपए बांटने बाकी हैं।


मेरे गेहूं तो घर भी नहीं आए
मांडल क्षेत्र के मांगीलाल के दो बीघा में गेहूं की बुवाई की। 15 बोरी गेहूं मिले। मांगीलाल ने बताया कि बुवाई से पहले कुछ व्यापारी से पैसा उधार लाया था। जब गेहूं निकाले उसी दिन व्यापारी मेरे खेत से गेहूं खरीदकर ले गए। इसके लिए मुझे ााव १३ रुपए किलो ही भाव मिले। जब सरकार को गेहूं खरीदने थे अब तक खरीद शुरू क्यों नहीं की। हमारी तो मजबूरी थी इसलिए जल्दी बेचने पड़े।
मूंग बेचे उसका पैसा नहीं मिला


सुवाणा क्षेत्र के नारूलाल गाडरी ने चार बोरी मूंग चार माह पहले बेचे। उस पैसे से उसे बच्चों की शादी में लिया कर्ज उतारना था। सरकारी एजेंसी ने मूंग खरीदा लेकिन गाडरी को पैसा अब तक नहीं मिला। नारू ने पैसा ब्याज पर लिया। अब जब तक सरकार का पैसा आएगा, तब तक ब्याज भी बहुत हो जाएगा। नारू बोला, किसान का भला सोचने वाला कोई नहीं है।

बाजार में बिक गए गेहूं, आज से खरीदेगी सरकार
किसानों के खेतों में गेहूं निकल चुके हैं। कई आढतिये औने-पोने दामों में ही गेहूं खरीदने के लिए किसानों के खेतों तक पहुंच गए। कई किसानों ने कर्जा ले रखा था तो किसानों को पूरा दाम नहीं मिला। जबकि सरकार अब दो अप्रेल से गेहूं खरीदेगी। यदि सरकार समय पर गेहूं खरीदकर किसानों को पैसा देती तो उन्हें इतने सस्ते दामों में गेहूं नहीं बेचने पड़ते।

किसानों के भुगतान के लिए आर्थिक मदद केन्द्र करता है। केन्द्र की ओर से नेफेड राजफैड को बजट उपलब्ध कराता है। अभी बजट आने वाला है। किसानों का भुगतान कराया जाएगा।
पारसमल जैन, उप रजिस्ट्रार, सहकारिता विभाग

कुछ किसानों का उड़द-मूंग का पैसा बकाया है। संभागीय आयुक्त की बैठक में भी यह समस्या सामने आई थी। इसके लिए प्रदेश स्तर पर अवगत करा दिया है। गेहूं खरीद केंद्र दो अप्रेल से शुरू होंगे। इसकी तैयारियां की जा चुकी है।

मुक्तानंद अग्रवाल, जिला कलक्टर
राजस्थान का अन्नदाता भाजपा राज में त्राहि-त्राहि कर रहा है। कई किसान ब्याज भरकर आत्महत्या कर चुके हैं। जहाजपुर में सरसों खरीद केंद्र बनाए हैं जबकि यहां चना की उपज ज्यादा हुई है। अब चना बेचने किसान कहां जाएगा। जिसने बेचा उसका पैसा नहीं मिल रहा है। इस राज में किसान ज्यादा परेशान है। मैं किसानों के हक के लिए फिर से सड़क पर आऊंगा।
धीरज गुर्जर, विधायक, जहाजपुर