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जर्जर स्कूलों की ‘शिफ्टिंग’ पर रार: निदेशालय के आदेश और धरातल की हकीकत में उलझे ‘गुरुजी’

भीलवाड़ा में क्षतिग्रस्त भवनों को खाली करने के आदेश, दूरी और संसाधनों के अभाव में विरोध

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Dispute over 'shifting' of dilapidated schools:

Dispute over 'shifting' of dilapidated schools:

प्रदेश के सरकारी स्कूलों में जर्जर और क्षतिग्रस्त भवनों के कारण बच्चों की जान पर मंडरा रहे खतरे को देखते हुए शिक्षा निदेशालय ने सख्त कदम उठाते हुए स्कूलों को निकटवर्ती सुरक्षित भवनों में शिफ्ट करने के आदेश जारी किए हैं। लेकिन भीलवाड़ा जिले में निदेशालय का यह आदेश अब विवादों और विरोधाभासों में फंस गया है। जिला शिक्षा अधिकारी की ओर से प्रधानाचार्यों से मांगी जा रही 'अनुशंसा' ने इस पूरे मामले को पेचीदा बना दिया है।

दूरी बनी बाधा, सुरक्षा पर सवाल

निदेशालय के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद धरातल पर शिक्षकों और प्रधानाचार्यों के सुर अलग-अलग हैं। कई स्कूलों को जर्जर होने के कारण अन्य संस्थानों में मर्ज या शिफ्ट किया जाना है, लेकिन शिक्षक इसका विरोध कर रहे हैं। उनका मुख्य तर्क दूरी है। शिक्षकों का कहना है कि 2 से 3 किलोमीटर दूर स्कूल शिफ्ट करने से छात्र संख्या गिर सकती है और अभिभावक छोटे बच्चों को इतनी दूर भेजने को तैयार नहीं हैं। वही शिक्षक भी बच्चों के 'ड्रॉप आउट' होने का खतरा भी महसूस कर रहे हैं।

अनुशंसा का खेल: आदेश की पालना में देरी

ताजा विवाद तब शुरू हुआ जब जिला शिक्षा अधिकारी ने जर्जर स्कूलों के प्रधानाचार्यों से शिफ्टिंग को लेकर अनुशंसा पत्र मांगे। पत्र में यह विकल्प दिया गया है कि क्या वे अन्य विद्यालय में शिफ्ट होना चाहते हैं या पुराने भवन के सुरक्षित हिस्से में ही कक्षाएं संचालित करना चाहते हैं। शिक्षकों का तर्क है कि हमारे पास भवन भले ही जर्जर हैं, लेकिन कुछ कमरे सुरक्षित हैं। हम जोखिम उठाकर यहीं बच्चों को पढ़ा लेंगे, लेकिन दूर नहीं जाएंगे। उधर निदेशालय के अनुसार किसी भी सूरत में क्षतिग्रस्त भवनों में कक्षाएं नहीं लगनी चाहिए ताकि कोई अनहोनी न हो।

सुवाणा ब्लॉक से उठी विरोध की चिंगारी

पंचायत प्रारंभिक शिक्षा अधिकारी और ब्लॉक सुवाणा के तहत आने वाले स्कूलों जैसे राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय के जर्जर भवनों को अन्य स्कूल में शिफ्ट करने की अनुशंसा की गई। लेकिन दूरी अधिक होने के कारण अब इसे अन्य सुरक्षित भवनों या पुराने विद्यालय के ही सुरक्षित भाग में चलाने की मांग उठने लगी है। जर्जर हिस्से में आवागमन पूर्णतः प्रतिबंधित करने का दावा तो किया जा रहा है, लेकिन जर्जर छत के नीचे मासूमों का भविष्य कितना सुरक्षित है, यह बड़ा सवाल है। राजस्थान शिक्षक संघ (प्रगतिशील) के प्रदेशाध्यक्ष नीरज शर्मा का कहना है कि नियमों और सुरक्षा के बीच विरोधाभास के कारण निदेशालय के आदेशों की पालना अटक गई है। यदि जर्जर भवन गिरा नहीं और वहीं स्कूल चलता रहा, तो किसी भी हादसे की जिम्मेदारी कौन लेगा।