इसे स्वाद का असर कहे या मानें कि भीलवाड़ा शहर के लोग चटोरे हो गए हैं। मोटे अनुमान के अनुसार भीलवाड़ा के लोग प्रतिदिन लगभग एक लाख की संख्या में कचौरी, समोसे, आलूबड़े या अन्य नमकीन चट करते हैं। ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं, जिनकी सुबह की शुरुआत कचौरी के नाश्ते से होती है।
भीलवाड़ा/ पत्रिका न्यूज नेटवर्क। इसे स्वाद का असर कहे या मानें कि भीलवाड़ा शहर के लोग चटोरे हो गए हैं। मोटे अनुमान के अनुसार भीलवाड़ा के लोग प्रतिदिन लगभग एक लाख की संख्या में कचौरी, समोसे, आलूबड़े या अन्य नमकीन चट करते हैं। ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं, जिनकी सुबह की शुरुआत कचौरी के नाश्ते से होती है। कई लोग सवेरे दुकान खुलते ही कचौरी या अन्य नमकीन के लिए दौड़ते हैं। अलग-अलग चटनी के साथ दो कचौरी या समोसे खाए बिना नहीं लौटते। शहर में ऐसे कई शौकीन हैं, जिन्हें चिकित्सक सलाह दे चुके हैं कि वे कचौरी-समोसे न खाएं। यह बात अलग है कि जुबां पर चढ़े स्वाद के कारण ऐसे लोग कचौरी-समोसे या नमकीन देखते ही खुद पर नियंत्रण नहीं लगा पाते।
हर जगह का अलग है स्वाद
शहर में कहने को तो हर चौराहे व प्रमुख मार्ग पर कचौरी, समोसे की दुकान है। शहर में दो दर्जन से अधिक जगह कचौरी की प्रसिद्ध दुकानें चलती है। हर चौराहे पर अलग-अलग स्वाद। प्याज की पकौड़ी के आज भी कई दीवाने हैं। मूंग दाल की पकौड़ी का अलग स्वाद है। महावीर पार्क के पास प्याज की कचौरी लाल मीठी और हरी तीखी चटनी के साथ ऊपर से दही डालकर परोसी जाती है।
पेच एरिया में शाही समोसा, खस्ता कचौरी-चटनी के साथ और हींग का पानी भी दिया जाता है। गोल प्याऊ चौराहे पर एक व्यापारी की कचौरी का अलग स्वाद है। यहां लकड़ी के गट्टों को डालकर सिगड़ी की धीमी आंच पर कचौरी व मिर्ची बड़े सेके जाते हैं। यहां ग्राहकों को इंतजार करना पड़ता है। बापूनगर में तीखी कचौरी के नाम से अलग स्वाद है। शहर में दही, कढ़ी, चटनी, नवरतन व लहसुन की चटनी के साथ कचौरी खाई जाती है। कम मिर्च के मिर्ची बडे भी काफी पसंद किए जाते हैं।
शुद्धता की परख कैसे करें
- कड़ाई में बार-बार एक ही तेल का उपयोग तो नहीं हो रहा।
- दुकान के कर्मचारी ने दस्ताने पहन रखे हैं या नहीं।
- भट्टी व कचौरी-समोसे के पास साफ-सफाई है या नहीं।
ज्यादा खाने से सेहत पर यह प्रभाव- (डॉ. अमित गुर्जर, चिकित्सक, एमजीएच )
सवाल : अधिक कचौरी-मिर्ची बड़ा या आलूबड़ा खाने से सेहत पर क्या असर पड़ सकता है ?
जवाब: कचौरी व आलूबड़ा में मसाले अधिक होते हैं। इसके खाने से पेट सम्बंधी रोग व गैस्ट्रोएंटरोलॉजी की बीमारी हो सकती है।
सवाल : बार-बार कचौरी-नमकीन खाने की चाह कोई बीमारी माना जा सकता है ?
जवाब: चटपटा खाना किसी बीमारी के लक्षण नहीं है, लेकिन लीवर के लिए घातक हो सकता है।
सवाल : यदि किसी को बाहर का नाश्ता करने की आदत पड़ गई है तो इससे कैसे बचा जा सकता है?
जवाब: बार-बार नाश्ता करने से बचने के लिए काम में व्यस्त रहना चाहिए।
तेल का ज्यादा बार उपयोग हानिकारक-
उपयोग के बाद जो जला तेल बचता है उसका एकत्रीकरण अलग से करना चाहिए। व्यवसायी चार बार खाद्य तेल का उपयोग तलने के लिए कर सकते हैं। आठ से दस बार उपयोग करने पर इसमें तली वस्तुएं सेहत के लिए हानिकारक होती है।
-प्रेम शर्मा, खाद्य सुरक्षा अधिकारी भीलवाड़ा