
From Chulgiri to Chanveshwar: An amazing saga of 1000 years of faith and miracles
अरावली की कालीघाटी की ऊॅंची पहाड़ी पर स्थित चंवलेश्वर पार्श्वनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र आज प्रदेशभर में आस्था, चमत्कार और भव्य निर्माण का केंद्र है। यहां विराजमान भगवान पार्श्वनाथ की लगभग एक हजार वर्ष पुरानी धूसर रंग की पद्मासन मूर्ति भक्तों की आस्था का प्रमुख आधार है। यह तीर्थ स्थल जैन ही नहीं बल्कि गैर-जैन भक्तों के लिए भी गहरी आस्था का केंद्र है। इस तीर्थ क्षेत्र को लघु सम्मेद शिखर के नाम से जाना जाता है।
भगवान पार्श्वनाथ की चमत्कारी मूर्ति
बिजौलिया अतिशय क्षेत्र के शिलालेखों के अनुसार भगवान पार्श्वनाथ का समवशरण चंवलेश्वर की ऊँची पहाड़ी पर भी आया था। मूर्ति की खोज एक चमत्कारिक घटना से जुड़ी है। कहा जाता है कि सेठ नथमल शाह की गाय प्रतिदिन पहाड़ी पर एक स्थान पर दूध छोड़ देती थी। सपने में आदेश मिलने पर सेठ नथमल शाह ने वि. सं. 1272 वैशाख शुक्ल 10 को मूर्ति की पंच कल्याणक प्रतिष्ठा कर मंदिर का निर्माण करवाया। यहां 21 दिनों तक भगवान पार्श्वनाथ का समवशरण विराजमान था और पार्श्वनाथ भगवान की देशना हुई थी इसलिए मुनि सुधासागर महाराज ने इस क्षेत्र को देशनोदय नाम प्रदान कर अन्तरराष्ट्रीय पटल पर एक कीर्तिमान स्थापित किया।
ऐतिहासिक धरोहर
प्राचीन काल में इस पहाड़ी को चूलगिरि कहा जाता था। वर्ष 1216 में यहाँ मंदिर निर्माण का उल्लेख मिलता है। मंदिर तक पहुँचने के लिए 110 सीढ़ियाँ बनी हुई हैं।
100 बीघा भूमि पर बनेगा भव्य तीर्थ
ट्रस्ट अध्यक्ष प्रकाश कासलीवाल ने बताया कि निर्यापक मुनि पुंगव सुधासागर महाराज के निर्देशन में विशाल योजना आकार ले रही है। 100 बीघा भूमि पर 24 जिनालय, शहस्त्रकूट जिनालय और मूलनायक भगवान का विशाल मंदिर तैयार होगा। तीन मंजिला संत भवन और वातानुकूलित भोजनशाला का भी निर्माण चल रहा है। सभी मंदिर सफेद संगमरमर पाषाण के पत्थर से निर्मित हो रहे हैं। ट्रस्ट सदस्य प्रकाश गंगवाल के अनुसार परिसर में एक हजार से अधिक पौधे रोपे गए हैं, जो श्रद्धालुओं को छाया व शांति प्रदान करेंगे। यह क्षेत्र आगामी वर्षों में देशभर के जैन समाज व पर्यटकों के लिए आस्था और पर्यटन का बड़ा केंद्र बनेगा।
आस्था और पर्यटन का संगम
यह तीर्थ स्थल जैन ही नहीं, बल्कि गैर-जैन श्रद्धालुओं के लिए भी आस्था का केंद्र है। चमत्कारों से जुड़ी कई कहानियाँ आज भी लोगों में प्रचलित हैं। आने वाले वर्षों में यह स्थान राज्य स्तरीय धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित होगा। क्षेत्र पर हर वर्ष आसोज बदी दोज एवं पोष बदी नवमी-दशमी पर विशाल मेले का आयोजन होता है।
पहुंचने का सड़क मार्ग
सड़क मार्ग: मांडलगढ़, जहाजपुर, भीलवाड़ा, शाहपुरा से टैक्सी व बसें आसानी से उपलब्ध।
रेलमार्ग: नजदीकी स्टेशन मांडलगढ़ (40 किमी)।
हवाई मार्ग: उदयपुर, जयपुर और किशनगढ़ हवाई अड्डे से सुगम।
दूरी विवरण: मांडलगढ़ -41 किमी, भीलवाड़ा- 55 किमी, देवली-60 किमी, जहाजपुर-36 किमी
Published on:
07 Sept 2025 11:39 am
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