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घास भैंरू की सवारी देखने उमड़े ग्रामीण

दीपावली के दूसरे दिन अन्नकूट पर घास भैरू की सवारी निकाली गई

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दीपावली के दूसरे दिन अन्नकूट पर घास भैरू की सवारी देखने के लिए हजारों की संख्या में जमा ग्रामीण व घास भैरू की सवारी खीचते बैल

शाहपुरा।
दीपावली के दूसरे दिन अन्नकूट पर घास भैरू की सवारी देखने के लिए हजारों की संख्या में ग्रामीण जमा थे। गोवर्धन की मध्य रात इस सवारी का सभी वर्गों के लोग शामिल थे। सवारी का आनंद लेने के लिए लोग रातभर जागते रहे। इस बार सवारी के दाैरान कड़ी से बनी ट्रॉली टूट जाने से यह बीच में टूट जाने से यह फूलिया गेट का यहां रूक गई। इस जगह पर देव उठनी एकादशी तक घास भैरू की पूजा होगी।

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रावला घाट के पास में घास भैरू के स्थान पर विशेष प्रकार की चौखट बनाई गई। चौखट नए पेड़ की लकड़ी से बनाई गई। सवारी के लिए पंच पटेल नियुक्त कर रखे हैं। गोवर्धन के दिन किसानों ने अपने बैलों को सजा धजा कर पूजा अर्चना की तथा चावल, लापसी खिलाई। बाद में बैलों की जोड़ी ढ़ोल नगाड़ों के बीच चौखट पर पहुंची। जहां पंच पटेलों का संकेत मिलने के बाद पूजा शुरू हुई। इस बीच घास भैरू के चावल का भोग लगने पर सिंदूर चढ़ाने का बाद धूप दी गई। इस दौरान नाई मशाल लेकर खड़ा रहा।

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रावला घाट से शुरू हुई सवारी ने शाहपुरा कस्बे की परिक्रमा शुरू की बाद में कई बैलों की जोडियां इसमें जुड़ती हटती रहती है। इस दौरान कस्बेवासी घास भैंरू की सवारी के दौरान जमकर आतिशबाजी करते रहे और अपने बैलों को भड़काते रहे। लेकिन लकड़ी से बनी ट्रॉली टूट जाने से यह बीच में टूट जाने से यह फूलिया गेट का यहां रूक गई। इस जगह पर देव उठनी एकादशी तक घास भैरू की पूजा होगी।

धार्मिक मान्यता के साथ जुड़ा मनोरंजन
धार्मिक मान्यता के साथ-साथ मनोरंजन भी इससे जुड़ा हुआ है। घास भैरू की सवारी से शहर में बैलों का शक्ति परीक्षण होता है। जो बैलों की जोड़ी खींचती है उसके स्वामी को बधाइयां दी जाती है।

40 हजार की आबादी में मात्र सात जोड़ी बैल
लगातार बैलों की संख्या कम होने से परंपरा निर्वहन करने में परेशानी हो रही है। पूरे शाहपुरा कस्बे में मात्र सात जोड़ी बैल रह गए हैं।

बरूंदनी में भी निकली घास बावजी की सवारी

बरूंदनी में घास बावजी की सवारी देखने के लिए हजारों की संख्‍या में ग्रामीण उमड़े। बारी बारी से बैलों की जोड़ियों ने घास बावजी को खींचा। ग्रामीण जयकारों के साथ बैलों के पीछे भागते रहे। बैलों की जोड़ी जहां रुक जाती है, वहां से बैलों की दूसरी जोड़ी जोती गई। गांव का नाई घास भैरू के साथ मशाल जलाकर साथ चलता रहा। ग्रामीणों में घास भैरू को हाथ लगाने की होड़ लगी रही। जिसका हाथ बैल को छू जाता वह अपने आप को धन्य समझता। सवारी देखने के लिए बरूंदनी, धाकड़खेड़ी, बागीत, सिंगोली, जोजवा, मोटरों का खेड़ा, सुरास, बड़लियास सहित जिले के कई गांवों के लोग पहुंचे।

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