
माइका निर्यात पर पाबंदी की सुगबुगाहट, खदान कारोबारियों व निर्यातकों में भारी रोष
केंद्र सरकार की ओर से माइका (अभ्रक) के निर्यात को प्रतिबंधित श्रेणी में डालने के संभावित प्रस्ताव से राजस्थान सहित देश भर के खनिज और खनन उद्योग में हड़कंपमच गया है। विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) की ओर से गत दिनों जारी एक नोटिस के बाद भीलवाड़ा माइंस व पर्यावरण सुधार समिति और खनिज निर्यातकों ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
समिति ने केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल और डीजीएफटी को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपकर इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध दर्ज कराया है। कारोबारियों ने चेतावनी दी है कि यदि माइका निर्यात पर किसी भी तरह की रोक या लाइसेंसिंग की जटिलता थोपी गई, तो इसके बेहद गंभीर आर्थिक परिणाम होंगे और खदानों से जुड़े लाखों मजदूरों की रोजी-रोटी छिन जाएगी।
समिति की ओर से सीए मानवेंद्र कुमावत ने ज्ञापन में स्पष्ट किया है कि सरकार को बैन या पाबंदी की बजाय निर्यात को बढ़ावा देने वाली नीतियों पर काम करना चाहिए। ज्ञापन में विभिन्न तर्क दिए गए हैं। इनमें माइका खनन और निर्यात से केवल निर्यातक ही नहीं, बल्कि खदान संचालक, मजदूर, ट्रांसपोर्टर, छंटाई करने वाले और स्थानीय बाजार जुड़े हैं। निर्यात रुकने से ग्रामीण और खनिज बहुल जिला भीलवाड़ा की अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी। समिति का तर्क है कि निर्यात पर रोक लगाने से व्यापार खत्म नहीं होगा, बल्कि इसके उलट अवैध और गैर-पारदर्शी व्यापार को बढ़ावा मिलेगा। इससे ईमानदार और नियम-कानून मानने वाले निर्यातकों को नुकसान होगा। अंतरराष्ट्रीय खरीदार केवल कीमत नहीं, बल्कि सप्लाई की निरंतरता देखते हैं। अचानक पाबंदी से विदेशी बाज़ारों में भारत की एक विश्वसनीय सप्लायर वाली छवि खराब होगी और विदेशी खरीदार दूसरे देशों का रुख कर लेंगे। यह कदम प्रधानमंत्री के'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस निर्यात संवर्धन और रोजगार सृजन के मूल विजन के बिल्कुल विपरीत है।
माइका के निर्यात को मुक्त श्रेणी में ही बरकरार रखा जाए और इसे प्रतिबंधित श्रेणी में डालने का प्रस्ताव तुरंत खारिज हो।अगर सरकार को अवैध खनन या किसी अन्य बात की चिंता है, तो इसका समाधान डिजिटल सर्टिफिकेशन, ई-परमिट और ऑडिट के जरिए निकाला जाना चाहिए, न कि निर्यात को रोककर। जो निर्यातक कानूनी रूप से और वैल्यू एडिशन के साथ काम कर रहे हैं, उन्हें सरकार की ओर से विशेष प्रोत्साहन दिए जाएं। इस तरह का कोई भी नीतिगत फैसला लेने से पहले राज्य सरकारों, उद्योग संगठनों और निर्यातकों से आमने-सामने की विस्तृत चर्चा की जाए।
गौरतलब है कि सिंथेटिक विकल्पों और फॉरेस्ट कंजर्वेशन एक्ट की सख्ती के कारण भारतीय माइका निर्यात पहले से ही कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में एक मजबूत सप्लाई चेन वाले इस सेक्टर को पाबंदियों में जकड़ने से विदेशी मुद्रा का भारी नुकसान होगा। भीलवाड़ा के कारोबारियों ने सरकार से साफ कहा है कि नीति-निर्माताओं को नो बैन, नो रेस्ट्रिक्शन का रास्ता अपनाना चाहिए।
Published on:
27 Apr 2026 08:36 am
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