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सरकार ने सपनेे दिखा छीनी ग्रामीणों की सुविधा, कागजों में ही दफन हो गई पंचायतों तक रोडवेज बसें चलाने की योजना

सपने दिखाकर चकनाचूर करना है तो राजस्थान परिवहन से सीखिए। घाटे से उभरने के लिए योजनाओं का खाका तो तैयार कर लिया जाता है

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सपने दिखाकर चकनाचूर करना है तो राजस्थान परिवहन से सीखिए। घाटे से उभरने के लिए योजनाओं का खाका तो तैयार कर लिया जाता है। धरातल की बात आती है तो हश्र कुछ और होता है

भीलवाड़ा।

सपने दिखाकर चकनाचूर करना है तो राजस्थान परिवहन से सीखिए। घाटे से उभरने के लिए योजनाओं का खाका तो तैयार कर लिया जाता है। धरातल की बात आती है तो हश्र कुछ और होता है। पराए कंधों पर आस लेकर गांवों तक सरपट रोडवेज बसों को दौड़ाने का खाका खींचने वाला महकमें की योजना एक बार फिर धाराशायी हुई है। इस बार पंचायतों को पंचायतों से जोड़कर आवागमन सुविधा आसान करने का वादा किया था। सच्चाई यह है कि जिले की 290 पंचायतों में रोडवेज चलाने की योजना एक दशक से कागजों में गोते लगा रही है। सरकार के बूते पर योजना का खाका तो तैयार कर लिया, लेकिन संसाधन और बसों नहीं मिलने पर हाथ खींच लिए। हालात यह है कि ग्रामीणों को अब भी अवागमन के लिए भटकने को मजबूर होना पड़

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मिनी बसें चलने थी, अवैध संचालन बंद हो जाता
गांवों में रोडवेज की फ्रेंचाइजी पर रूट देकर बीस सीटर मिनी बसें चलाने की योजना थी। रोडवेज की मिनी बस चलाने से ग्रामीण क्षेत्र में चलने वाले अवैध वाहनों पर रोक लग सकती थी। वहीं रोडवेज की 50 सीटर बसों को भरने में समय लगता है। ऐसे में अवैध रूप से चल रहे छोटे वाहन सवारियां भरकर चल देते हैं। रोडवेज या अनुबंध पर छोटी बस चलाए जाने से बस जल्दी भरेती और समय पर रवाना होने से ग्रामीण इसमें बैठना भी पसंद करते।

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ग्रामीण परिवहन सेवा भी हुई धाराशायी

पंचायतों को जोडऩे की योजना में अमल में नई आ पाई तो ग्रामीण परिवहन सेवा के नाम से रोडवेज ने योजना शुरू की। लेकिन कुछ दिनों चलने के बाद अवैध संचालन के चलते भीलवाड़ा में योजना भी फेल हो गई। करीब १५ बसें ग्रामीण परिवहन सेवा के नाम से चल रही थी।

यह बनी थी योजना
रोडवेज ने जिला मुख्यालय से पंचायत को रोडवेज बस सेवा जोडऩे के लिए एक दशक पूर्व प्रस्ताव मांगा था। हर आगार को पंचायतों को रोडवेज से जोडऩे के लिए सर्वे कर रिपोर्ट तैयार की थी। डेढ़ माह तक भीलवाड़ा आगार अधिकारियों ने सर्वे किया और 290 पंचायतों को जोडऩे की योजना तैयार की थी। पंचायतों को जोडऩे के लिए 12 हजार किलोमीटर का नया परिचक्र बनाया गया था। इसके लिए करीब डेढ़ सौ बसों की आवश्यकता बताई गई। इसके लिए सरकार को प्रस्ताव बनाकर भी भेजा गया था। लेकिन सरकार ने इसमें रूचि ही नहीं दिखाई। ना बसें खरीदी गई ना ही संसाधन उपलब्ध करवाए। इससे योजना फेल हो गई।

सरकार ने ध्यान नहीं दिया
पंचायतों को जोडऩे की योजना बनाई तो गई थी। लेकिन योजना अमल में नहीं आ पाई। सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया।
सुधांशु राय नागौरी, मुख्य प्रबंधक, भीलवाड़ा आगार