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Rajasthan News : मोबाइल की बढ़ती लत इंसान का व्यवहार तक बदल रही, बढ़ रही यह बीमारी, बच्चे भी हो रहे इसका शिकार

बिना मोबाइल के मन में बेचैनी व गुस्से जैसी स्थिति उपजने लगती हैं। विशेषज्ञ के अनुसार, बिहेवियरल एडिक्शन जैसे मोबाइल एडिक्शन, गैंबलिंग, ऑनलाइन गेमिंग, ऑनलाइन डेटिंग में भी डोपामीन बढ़ता है और बढ़ोतरी की मात्रा कई गुना ज्यादा होती है। जिससे रोजमर्रा के आनंदमयी गतिविधियों से आनंद मिलना खत्म हो जाता है।

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Bhilwara News : भीलवाड़ा. मोबाइल अब लोगों में ये बदलाव कर चुका है कि बार बार कुछ देर में इसे देखना अनिवार्य लगता है। कुछ बच्चे व बड़े इसके आदतन शिकार हो चुके हैं। इतना ही नहीं कई लोग तो दिनभर मोबाइल में ही खोए रहते हैं। उनके हाथ से पलभर के लिए भी मोबाइल नहीं छूटता। मनोरोग विशेषज्ञ इसे मेडिकल टर्म में बिहेवियरल एडिक्शन का नाम दिया गया है। शुरुआत में इसका पता नहीं चलता, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता है, वैसे-वैसे यह ड्रग्स की तरह हो जाता है। बिना मोबाइल के मन में बेचैनी व गुस्से जैसी स्थिति उपजने लगती हैं। विशेषज्ञ के अनुसार, बिहेवियरल एडिक्शन जैसे मोबाइल एडिक्शन, पोर्न एडिक्शन, गैंबलिंग, ऑनलाइन गेमिंग, ऑनलाइन डेटिंग में भी डोपामीन बढ़ता है और बढ़ोतरी की मात्रा कई गुना ज्यादा होती है। जिससे रोजमर्रा के आनंदमयी गतिविधियों से आनंद मिलना खत्म हो जाता है।

विथड्रॉल इफैक्ट आते हैं नजर
एमजीएच के मनोचिकित्सक डॉ. वीरभान चंचलानी ने कहा कि स्मार्टफोन के इस्तेमाल (Smartphone usage) या इसी तरह के अन्य व्यवहारों को अगर रोका जाता है तो विथड्रॉल इफ़ेक्टस देखने को मिलते हैं। जो शराब के मामलों में देखा जाता है। जैसे काम में अरुचि, चिड़चिड़ापन, स्मार्टफोन की मांग, बैचनी व उदासीनता जो लम्बे समय तक बनी रहती है। शुरू में तो स्मार्टफोन का इस्तेमाल आनंद को हासिल करने के लिए होता है, लेकिन बाद में यही उसके ना मिलने से एक जरुरत बन जाती है, जिसे 'कंप्लसिविटी' कहा जाता है। ऐसे केस में मनोचिकित्सकीय इलाज़ की अहमियत रहती है। तलब, उदासीनता एवं चिड़चिड़ापन कम करने की दवा के साथ 'बिहेवियर थैरेपी' की भी भूमिका रहती है।

पहचानें लक्षण ताकि लत में न बदल जाए मोबाइल का इस्तेमाल
पूजा शर्मा अक्सर शिकायत करती है कि 14 साल का बेटा सौरभ कोविड के बाद से मोबाइल का अत्यधिक इस्तमाल करने लग गया है। लगभग 8 से 10 घंटे मोबाइल पर बिताता है। सोशियल साइट्स पर कई तरह की रील्स डालना व वर्चुअल दोस्तों से चैट आदत बन चुका है, जबकि असल जिंदगी में लोगों से बिलकुल अलग हो गया है, अपने में ही रहने लगा है। पढ़ाई छूटने लगी है तो आसपास के दोस्तों से भी नाता टूट गया है। दिनचर्या बदल गई है। रातभर मोबाइल देखना व दिनभर सोना आदत हो गई है। उससे मोबाइल लेना अब नामुमकिन सा है। फोन रिचार्ज नहीं है या इंटरनेट बंद है तो पूरे दिन चिड़चिड़ाहट और गुस्सा करने लगता है। मोबाइल नहीं लेने का दबाव बनाने पर मरने तक की धमकी देने से नहीं चूकता। ऐसे ही हाल कमोबेश हर घर में बच्चों में नजर आने लगे हैं।

ये हो सकती वजह
दिखावे की बढ़ती प्रतिस्पर्धा

बढ़ते एकल परिवार

साथियों का दबाव

स्मार्ट फोन व इंटरनेट की आसान उपलब्धता

माता पिता के बच्चों के साथ बिताए गुणवत्ता समय का अभाव

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